बिहार में जमीन विवादों के लंबे समय तक लंबित रहने की समस्या पर अब प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि भूमि से जुड़े वादों का निष्पादन हर हाल में तीन महीने के भीतर किया जाएगा। इसके साथ ही, ‘लंबित’ मामलों की परिभाषा भी तय कर दी गई है, जिससे फाइलों को बेवजह अटकाने की गुंजाइश कम होगी।
अब केवल उन्हीं मामलों को ‘लंबित’ माना जाएगा, जिनमें सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी), 1908 के तहत किसी सक्षम न्यायालय द्वारा ‘स्टे ऑर्डर’ या ‘अस्थायी निषेधाज्ञा’ जारी की गई हो। इसके अलावा अन्य सभी मामलों को हर हाल में समय-सीमा के भीतर निपटाना होगा। बिना ठोस कानूनी रुकावट के फाइल दबाकर बैठने वाले अफसरों पर गाज गिरना तय है।
प्रधान सचिव सीके अनिल ने सभी डिविजनल कमिश्नर, कलेक्टर और भूमि सुधार डिप्टी कलेक्टर को लेटर लिखकर साप्ताहिक समीक्षा बैठक अनिवार्य करने को कहा है, ताकि तय समय-सीमा में मामलों का निष्पादन सुनिश्चित हो सके। अलग-अलग मामलों के लिए तय समय सीमा के अनुसार दाखिल-खारिज, अपील, जमाबंदी रद्दीकरण, लगान निर्धारण, बटाइदारी वाद, अतिक्रमण और भू-हदबंदी जैसे अधिकांश मामलों को 30 से 90 दिनों के भीतर निपटाना होगा।
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने चेतावनी दी है कि आरसीएमएस (RCMS) या बिहार भूमि पोर्टल पर दर्ज मामलों में देरी कतई बर्दाश्त नहीं होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अनावश्यक विलंब, लापरवाही या उदासीनता दिखाने वाले कर्मियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार का लक्ष्य है कि बिहार के आम नागरिक को अपने ही हक की जमीन के लिए सालों इंतजार न करना पड़े। डिजिटल मॉनिटरिंग के जरिए अब हर फाइल की मूवमेंट पर मुख्यालय से नजर रखी जा रही है।