भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन परिसर में एक प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अशोक मंडप के समीप महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने स्वतंत्रता सेनानी और देश के प्रथम भारतीय गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) की प्रतिमा का अनावरण किया। यह प्रतिमा उस स्थान पर स्थापित की गई है, जहां पहले ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा लगी हुई थी।
इस परिवर्तन को औपनिवेशिक विरासत से जुड़े प्रतीकों की समीक्षा और भारतीय इतिहास के नायकों को प्रमुखता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
राष्ट्रपति भवन परिसर में बदला प्रतीक
राष्ट्रपति भवन, जो ब्रिटिश काल में वायसराय हाउस के रूप में निर्मित हुआ था, लंबे समय से भारत की प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था का सर्वोच्च प्रतीक रहा है। अशोक मंडप के पास स्थापित नई प्रतिमा न केवल एक स्थापत्य परिवर्तन है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की वैचारिक दिशा को भी दर्शाती है।
राजाजी की प्रतिमा का अनावरण महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने किया गया, जो दोनों नेताओं के ऐतिहासिक संबंधों और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान की याद दिलाता है।
कौन थे सी. राजगोपालाचारी?
सी. राजगोपालाचारी, जिन्हें स्नेहपूर्वक “राजाजी” कहा जाता है, स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल और पहले भारतीय गवर्नर-जनरल रहे। वे महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी और विश्वासपात्र माने जाते थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर भेजे गए अपने संदेश में कहा कि राजाजी और महात्मा गांधी के बीच गहरा विश्वास और मित्रता का संबंध था। उन्होंने इसे औपनिवेशिक स्मृतियों से मुक्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
एडविन लुटियंस और नई दिल्ली का निर्माण
ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस को 1911 में भारत की नई राजधानी दिल्ली के निर्माण का दायित्व सौंपा गया था। उनके डिजाइन किए गए कई भवन आज भी नई दिल्ली की पहचान हैं, जिनमें राष्ट्रपति भवन और अन्य केंद्रीय इमारतें शामिल हैं। दिल्ली का केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र आज भी “लुटियंस दिल्ली” के नाम से जाना जाता है।
हालांकि, स्वतंत्रता के बाद से ही औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाने और भारतीय पहचान को प्रमुखता देने की मांग समय-समय पर उठती रही है।
परपोते मैट रिडले ने जताया दुख
एडविन लुटियंस के परपोते मैट रिडले ने इस बदलाव पर प्रतिक्रिया देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (अब X) पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि उन्हें आश्चर्य और निराशा हुई कि उनके पूर्वज की प्रतिमा को हटाया जा रहा है।
हालांकि, भारत सरकार की ओर से इस निर्णय को देश की ऐतिहासिक प्राथमिकताओं के अनुरूप बताया गया है।
औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की दिशा में कदम
राजाजी की प्रतिमा की स्थापना को कई लोग औपनिवेशिक अवशेषों से मुक्ति और भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को उचित सम्मान देने की प्रक्रिया का हिस्सा मान रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई स्थानों के नाम बदलने और ऐतिहासिक स्थलों को भारतीय संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने के प्रयास हुए हैं।
राष्ट्रपति भवन परिसर में यह परिवर्तन प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाता है कि भारत अब अपने इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से पुनर्स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।