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केरल ने रैबिस‑रोकथाम के लिए “दया‑हत्याओं” सहित नया SOP मंजूर किया, स्थानीय आवारा कुत्ता प्रबंधन समितियों को निर्णय‑प्रक्रिया में शामिल

केरल सरकार ने आज अपने मुख्य स्वास्थ्य मंत्री के मंचन में एक नया मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) मंजूर किया, जिसके तहत पागलपन या अक्षम्य रोगग्रस्त आवारा कुत्तों की दया‑हत्याओं को स्थानीय निकायों के निर्मित ‘आवारा कुत्ता प्रबंधन समिति’ द्वारा निर्धारित किया जाएगा। यह कदम कुत्तों में रैबिस (कुत्ते के कुतरने से उत्पन्न विष) के प्रसार को रोकने और सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की दिशा में उठाया गया है, जबकि पशु कल्याण समूहों ने इस नीति पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं।

केरल में पिछले पाँच वर्षों में रैबिस मामलों में वृद्धि देखी गई है; राज्य के रोग नियंत्रण केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, 2022‑2024 के दौरान रैबिस संक्रमण के कारण 1 200 से अधिक मानव मामलों की रिपोर्ट की गई। इस वृद्धि का कारण मुख्य रूप से आवारा कुत्तों की जनसंख्या में अनियंत्रित वृद्धि और उनके बीच रोग का तेज़ी से फैलना माना गया है। सरकार ने इन आंकड़ों को देखते हुए, कुत्ते‑मानव संपर्क को न्यूनतम करने के लिए मौजूदा पशु नियंत्रण नीतियों को सख्त करने का प्रस्ताव रखा।

पिछले साल में केरल के कई जिलों में रैबिस‑संबंधी हताहतों की संख्या ने सार्वजनिक बहस को जन्म दिया था। स्थानीय स्तर पर कई बार कुत्तों को मारने के बजाय उनका उपचार करने की मांग उठी, परन्तु आर्थिक एवं तकनीकी सीमाओं के कारण रोग‑ग्रस्त कुत्तों के उपचार में सफलता दर घटती जा रही थी। इस कारण सरकार ने “दया‑हत्याओं” को एक वैकल्पिक उपाय के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे केवल अत्यधिक रोगग्रस्त या पागलपन की अवस्था में पहुँचे कुत्तों को ही निपटाया जाएगा।

नए SOP के तहत, प्रत्येक नगर पालिका या ग्राम पंचायत में ‘आवारा कुत्ता प्रबंधन समिति’ का गठन किया जाएगा, जिसमें पशु चिकित्सक, स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी और सामाजिक प्रतिनिधि शामिल होंगे। समिति को प्रत्येक मामले की चिकित्सीय रिपोर्ट, रोग परीक्षण के परिणाम और कुत्ते की व्यवहारिक स्थिति का अध्ययन करके निर्णय लेना होगा। निर्णय प्रक्रिया में कुत्ते के उपचार के संभावित विकल्पों की भी जाँच की जाएगी, और केवल तब ही दया‑हत्याओं की अनुमति दी जाएगी जब सभी उपचार विकल्प विफल सिद्ध हों।

समिति को हर महीने दो बार निरीक्षण रिपोर्ट तैयार करनी होगी, जिसमें कुत्तों की संख्या, रोग परीक्षण के परिणाम और दया‑हत्याओं की संख्यात्मक जानकारी शामिल होगी। इस रिपोर्ट को राज्य स्वास्थ्य विभाग को भेजा जाएगा, जिससे एक पारदर्शी निगरानी तंत्र स्थापित होगा। साथ ही, सरकार ने विशेष रूप से प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों को इस प्रक्रिया के लिए मान्यता दी है, ताकि दया‑हत्याओं के दौरान मानवीय मानकों का पूर्ण पालन किया जा सके।

कुत्ता मालिकों के समूह और पशु अधिकार संगठनों ने इस नई नीति के बारे में अपने विचार व्यक्त किए। पशु अधिकार समूह “प्राणी सुरक्षा” के प्रवक्ता ने कहा कि “रोग‑ग्रस्त कुत्तों की दया‑हत्याओं को केवल तभी लागू किया जाना चाहिए जब सभी वैकल्पिक उपचार असफल हो जाएँ, अन्यथा यह मानव‑पशु सहअस्तित्व के सिद्धांतों के विरुद्ध है।” वहीं, पशु चिकित्सक संघ के अध्यक्ष ने कहा कि “यदि उचित परीक्षण और उपचार के बाद भी कुत्ते में रोग के लक्षण नहीं बदलते, तो दया‑हत्याओं का चयन एक व्यावहारिक विकल्प बन सकता है, बशर्ते यह प्रक्रिया कड़ाई से नियमनित हो।”

स्थानीय प्रशासन के प्रमुखों ने भी इस नीति के समर्थन में कहा कि “रैबिस का प्रसार रोकना हमारा प्राथमिक कर्तव्य है, और यह नई प्रक्रिया हमें अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने में मदद करेगी।” उन्होंने कहा कि यह उपाय केवल रोग‑ग्रस्त कुत्तों के लिए है और स्वस्थ आवारा कुत्तों के कल्याण को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।

दूसरी ओर, कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में इस नीति के कार्यान्वयन को लेकर चिंता भी जताई जा रही है। ग्रामीण चिकित्सक ने बताया कि कई बार कुत्ते के रोग परीक्षण में समय‑सीमा के कारण परिणाम देर से मिलते हैं, जिससे कुत्ते को अनावश्यक दर्द सहना पड़ता है। उन्होंने सुझाव दिया कि त्वरित परीक्षण सुविधा और मोबाइल पशु अस्पतालों की व्यवस्था की जाए, जिससे कुत्तों को जल्दी से जल्दी उचित देखभाल मिल सके।

राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि SOP के कार्यान्वयन के पहले चरण में 10 जिलों में पायलट प्रोग्राम चलाया जाएगा। इस अवधि में विभिन्न चुनौतियों का सामना करने के बाद ही पूरे राज्य में इसे व्यापक रूप से लागू किया जाएगा। विभाग ने यह भी कहा कि SOP के तहत किसी भी कुत्ते को मारने से पहले उसके मालिक से संपर्क किया जाएगा, यदि वह उपलब्ध हो। यदि कुत्ते का मालिक नहीं मिल पाता, तो स्थानीय अधिकारी ही अंतिम निर्णय लेंगे।

आर्थिक दृष्टि से यह उपाय राज्य के स्वास्थ्य खर्च पर सकारात्मक प्रभाव डालने की संभावना रखता है। रैबिस उपचार की लागत अत्यधिक होती

Updated: August 24, 2026

Kerala’s new SOP turns rabies control into a bureaucratic triage, betting that a “humane‑kill” board will curb outbreaks faster than costly vaccinations—yet its reliance on delayed diagnostics risks swapping one public‑health crisis for another.

If the pilot’s oversight proves token, the policy could

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