से अधिक के स्तर पर रही, जिससे राज्य के राजस्व में अतिरिक्त प्रावधान हुए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ओणम के दौरान शराब की मांग में पारंपरिक रूप से वृद्धि देखी जाती है, पर इस साल की वृद्धि अपेक्षा से अधिक रही।
केरल में शराब के व्यापार का इतिहास जटिल है। 1996 में राज्य ने शराब की बिक्री
पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे एक अंडरग्राउंड बाज़ार का उदय हुआ। 2010 में प्रतिबंध को हटाने के बाद, शराब का लाइसेंसेड व्यापार धीरे-धीरे बढ़ा, और बीवको जैसी कंपनियों ने सरकारी अनुबंधों के माध्यम से बाजार में प्रवेश किया। इस अवधि में राज्य ने शराब पर कर वसूली को राजस्व का एक प्रमुख स्रोत बना लिया। ओणम,
जो कि केरल का प्रमुख सांस्कृतिक त्यौहार है, हमेशा से शराब की खपत में वृद्धि का कारण बना है, क्योंकि कई लोग उत्सव के साथ सामाजिक समारोहों में शराब का सेवन करते हैं।
वर्ष 2024 में केरल सरकार ने शराब पर अतिरिक्त कर दरें लागू की थीं, जिसका उद्देश्य आय में वृद्धि और शराब की अधिक सेवन को
नियंत्रित करना था। हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि कर वृद्धि ने कीमतों को बढ़ाकर उपभोक्ता वर्ग में विभाजन किया है। इससे उच्च वर्ग के उपभोक्ताओं ने अधिक महंगी ब्रांडों की ओर रुख किया, जबकि निचले वर्ग के लोग किफायती विकल्पों की ओर बढ़े। बीवको ने इन बदलावों को ध्यान में रखकर अपनी उत्पाद श्रृंखला में
विविधता लाई, जिससे विभिन्न कीमत स्तरों पर उपभोक्ता को आकर्षित किया गया।
ओणम की शुरुआत के साथ ही बीवको ने कई नई ब्रांडों का विज्ञापन शुरू किया। उन्होंने प्रमुख शहरों में विशेष प्रचार कार्यक्रम आयोजित किए, जहाँ मुफ्त सैंपल और डिस्काउंट ऑफ़र उपलब्ध कराए गए। इन पहलकों ने उपभोक्ता की रुचि को बढ़ाया और बिक्री में तेज़ी लाई।
साथ ही, राज्य की लाइसेंसिंग बोर्ड ने इस अवधि में अतिरिक्त लाइसेंस जारी किए, जिससे बिक्री बिंदुओं की संख्या बढ़ी। परिणामस्वरूप, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों दोनों में शराब की उपलब्धता में सुधार हुआ, जिससे कुल बिक्री में उल्लेखनीय इजाफ़ा हुआ।
बीवको के प्रबंधन ने बिक्री में इस इजाफ़े को ओणम की सांस्कृतिक परम्परा और बाजार की उचित योजना
के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कहा कि कंपनी ने उपभोक्ता की मांग के अनुसार उत्पादन क्षमता बढ़ाई और वितरण नेटवर्क को सुदृढ़ किया। साथ ही, उन्होंने बताया कि इस सीज़न में उन्होंने स्थानीय किसान से प्राप्त कच्चे माल का उपयोग किया, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को समर्थन मिला। बीवको ने यह भी कहा कि वह शराब के
जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियानों में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है।
केरल सरकार ने इस बिक्री इजाफ़े को राजस्व में सकारात्मक योगदान के रूप में सराहा। राज्य के वित्त विभाग के प्रमुख ने कहा कि ओणम अवधि में शराब कर से प्राप्त अतिरिक्त आय को सामाजिक कल्याण योजनाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों
में लगाया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार शराब की बिक्री पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए नियमित निरीक्षण और लाइसेंस की कड़ाई से निगरानी जारी रखेगी। सरकार ने कहा कि आय का एक हिस्सा शराब के दुरुपयोग से जुड़े रोगों के उपचार में उपयोग किया जाएगा।
उपभोक्ता संगठनों ने इस वृद्धि पर मिश्रित प्रतिक्रिया व्यक्त
की। कुछ समूहों ने कहा कि शराब की बिक्री में वृद्धि से सामाजिक समस्याओं में संभावित बढ़ोतरी हो सकती है, विशेषकर युवाओं में। उन्होंने शराब की उपलब्धता को सीमित करने और शिक्षा कार्यक्रमों को सुदृढ़ करने की मांग की। वहीं, व्यापार संघों ने कहा कि शराब उद्योग के बिना राजस्व में गिरावट आ सकती है, और इस
कारण से उद्योग को निरंतर समर्थन देना आवश्यक है। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि जिम्मेदार शराब सेवन पर सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है।
अर्थशास्त्रीयों ने इस डेटा को आर्थिक संकेतक के रूप में विश्लेषित किया। उन्होंने बताया कि शराब की बिक्री में वृद्धि उपभोक्ता खर्च में वृद्धि को दर्शाती है, जिससे आर्थिक गतिविधियों
में त्वरित प्रभाव पड़ता है। उन्होंने यह भी नोट किया कि शराब पर कर आय का हिस्सा सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में पुनर्निवेश किया जा सकता है, जिससे सार्वजनिक लाभ में सुधार हो सकता है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शराब की खपत में अनियंत्रित वृद्धि हुई तो सामाजिक लागत में भी वृद्धि हो सकती
है, जो अंततः आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे को सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से उठाया। उन्होंने कहा कि ओणम जैसे बड़े त्यौहारों के दौरान शराब की खपत में वृद्धि अक्सर दुर्घटनाओं और स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि का कारण बनती है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन से अनुरोध किया कि शराब बेचने
Updated: August 24, 2026
The 15 % sales jump signals that Kerala’s tax‑boost strategy is working, but it also signals a widening socio‑economic divide as higher‑priced brands siphon affluent consumers while lower‑priced ones crowd the market. If unchecked, this dual‑track growth could inflate both state revenue and public health costs in
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