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रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता, फरवरी में सऊदी अरब ने छह साल का रिकॉर्ड बनाकर दी कड़ी टक्कर

फरवरी माह में भारत के ऊर्जा आयात परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल भारत के लिए आपूर्ति संतुलन हमेशा रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से अहम रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, रूस ने लगातार अपनी स्थिति बरकरार रखते हुए फरवरी में भी भारत को कच्चा तेल आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश बना रहा, लेकिन इस बार सऊदी अरब ने भी जोरदार वापसी की और छह वर्षों में सबसे अधिक आपूर्ति कर रूस को कड़ी टक्कर दी।

ऊर्जा बाजार में यह घटनाक्रम केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरण, पश्चिमी प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि, शिपिंग और बीमा से जुड़े जोखिम, तथा मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव जैसे कई कारक जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि फरवरी के आंकड़े भारत के ऊर्जा सुरक्षा ढांचे और भविष्य की रणनीति को किस दिशा में ले जा सकते हैं।

रूस की पकड़ बरकरार, लेकिन मार्जिन घटा

यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच भारत ने अवसर का लाभ उठाते हुए रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल आयात करना शुरू किया था। इस रणनीति ने भारत को वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद की। फरवरी में भी रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना रहा, लेकिन उसके हिस्से में हल्की गिरावट देखी गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रिफाइनरियों ने कुछ रूसी ग्रेड के तेल की जगह अन्य स्रोतों की ओर रुख किया है। इसका एक कारण परिवहन लागत, भुगतान व्यवस्था में जटिलता और बीमा से जुड़ी अनिश्चितताएं हो सकती हैं। इसके अलावा, वैश्विक तेल बाजार में डिस्काउंट का अंतर भी पहले की तुलना में कम हुआ है, जिससे रूसी तेल की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कुछ घटती नजर आई।

सऊदी अरब की जोरदार वापसी

फरवरी में सऊदी अरब ने भारत को कच्चा तेल आपूर्ति में उल्लेखनीय वृद्धि की। यह वृद्धि पिछले छह वर्षों में सबसे अधिक मानी जा रही है। पश्चिम एशिया के इस प्रमुख उत्पादक ने एशियाई बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाई है।

सऊदी अरब ने एशियाई ग्राहकों के लिए अपने आधिकारिक बिक्री मूल्य (OSP) में कुछ नरमी दिखाई, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को आकर्षक विकल्प मिला। इसके साथ ही लॉजिस्टिक रूप से सऊदी तेल की आपूर्ति अपेक्षाकृत सरल और स्थिर मानी जाती है, क्योंकि भुगतान और बीमा व्यवस्थाएं स्पष्ट हैं।

ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय रिफाइनरियों ने अपने क्रूड बास्केट को संतुलित रखने के लिए सऊदी तेल की खरीद बढ़ाई है, ताकि अत्यधिक निर्भरता किसी एक देश पर न हो। इससे आपूर्ति जोखिम कम करने में मदद मिलती है।

मध्य-पूर्व में तनाव और आपूर्ति मार्गों की चिंता

फरवरी के आंकड़ों के साथ एक और अहम पहलू उभरकर सामने आया है—मध्य-पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव। खाड़ी क्षेत्र में जहाजरानी मार्गों पर बढ़ते जोखिम, विशेषकर लाल सागर और होरमुज़ जलडमरूमध्य के आसपास की अस्थिरता, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है।

यदि इन समुद्री मार्गों में व्यवधान बढ़ता है, तो भारत को वैकल्पिक मार्गों या अन्य देशों से आपूर्ति बढ़ानी पड़ सकती है। इससे न केवल परिवहन लागत बढ़ेगी, बल्कि शिपिंग समय और बीमा प्रीमियम भी प्रभावित हो सकते हैं।

भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वह अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में किसी भी क्षेत्रीय तनाव का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है।

भारतीय रिफाइनरियों की रणनीतिक संतुलन नीति

भारत की प्रमुख सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की रिफाइनरियां—जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और रिलायंस इंडस्ट्रीज—पिछले कुछ वर्षों से ‘डायवर्सिफिकेशन’ की नीति अपना रही हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।

रूसी तेल सस्ता होने के कारण आकर्षक बना हुआ है, लेकिन लॉन्ग-टर्म रणनीति के तहत भारत पश्चिम एशिया, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों से भी आयात बढ़ा रहा है। फरवरी में सऊदी अरब की बढ़ी हुई हिस्सेदारी इसी संतुलन नीति का हिस्सा मानी जा रही है।

वैश्विक कीमतों पर संभावित असर

यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है। ऐसी स्थिति में भारत को या तो अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी या फिर वैकल्पिक स्रोतों से आयात करना होगा।

हालांकि, फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित दायरे में हैं। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि किसी भी अप्रत्याशित सैन्य या राजनीतिक घटना से स्थिति तेजी से बदल सकती है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा: आगे की राह

फरवरी के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रहा है। रूस से रियायती तेल की खरीद जारी रखते हुए, सऊदी अरब और अन्य उत्पादकों के साथ संबंध मजबूत करना इसी नीति का हिस्सा है।

इसके अलावा, भारत दीर्घकालिक रूप से नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठा रहा है। लेकिन निकट भविष्य में कच्चे तेल पर निर्भरता कम होने की संभावना सीमित है। इसलिए आयात स्रोतों का संतुलन और समुद्री मार्गों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

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