पटना: Bihar Vidhan Sabha में बजट सत्र के दौरान बुधवार को जमकर हंगामा देखने को मिला। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखी बहस हुई। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के एक विधायक ने राज्य में लागू शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग करते हुए कहा कि वर्तमान व्यवस्था में कई व्यावहारिक दिक्कतें सामने आ रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है और निर्दोष लोगों को भी परेशान होना पड़ रहा है।
विधायक ने यह भी कहा कि यदि कोई अधिकारी जनप्रतिनिधियों के फोन का जवाब नहीं देता है या जनता की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करता है, तो उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। इस बयान के बाद सदन में माहौल गर्म हो गया। विपक्ष ने सरकार पर प्रशासनिक ढिलाई का आरोप लगाया, जबकि सरकार ने दावा किया कि कानून-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है।
बिहार की राजनीति में एक बार फिर शराबबंदी कानून चर्चा के केंद्र में है। वर्ष 2016 में लागू की गई पूर्ण शराबबंदी को मुख्यमंत्री Nitish Kumar की सबसे महत्वाकांक्षी और चर्चित पहलों में गिना जाता है। लेकिन अब लगभग एक दशक बाद, इसी कानून को लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर से समीक्षा की मांग उठने लगी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के कुछ सहयोगी नेताओं ने खुले तौर पर कहा है कि शराबबंदी के कारण राज्य को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है और इसके क्रियान्वयन में व्यावहारिक समस्याएं सामने आ रही हैं।
राजस्व संकट और बढ़ता वित्तीय दबाव
शराबबंदी लागू होने से पहले बिहार सरकार को आबकारी मद से हर साल हजारों करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता था। यह आय राज्य के विकास कार्यों और सामाजिक योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण स्रोत थी। शराबबंदी के बाद यह आय लगभग समाप्त हो गई।
वर्तमान में राज्य सरकार पर कई कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास का बड़ा वित्तीय बोझ है। ऐसे में आबकारी राजस्व की कमी को लेकर वित्तीय विशेषज्ञ लगातार चिंता जता रहे हैं। उनका मानना है कि यदि नियंत्रित और विनियमित तरीके से शराब बिक्री की अनुमति दी जाए, तो राज्य को राजस्व में बड़ी राहत मिल सकती है।
सहयोगियों की खुली नाराजगी
केंद्रीय मंत्री और एनडीए के वरिष्ठ नेता Jitan Ram Manjhi ने कहा है कि शराबबंदी का उद्देश्य भले ही सामाजिक सुधार रहा हो, लेकिन इसके कारण राज्य को “महत्वपूर्ण आर्थिक नुकसान” उठाना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि नीति के क्रियान्वयन में कमियां हैं और इस पर गंभीर समीक्षा की जरूरत है।
गठबंधन के कुछ अन्य नेताओं ने भी विधानसभा में विस्तृत चर्चा की मांग की है। उनका कहना है कि दस साल बाद किसी भी नीति का मूल्यांकन करना लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा है। समीक्षा में सामाजिक प्रभाव, आर्थिक नुकसान, कानून-व्यवस्था और जनता की राय—सभी पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।
कानून-व्यवस्था और क्रियान्वयन की चुनौतियां
शराबबंदी के तहत अब तक लाखों मामले दर्ज किए जा चुके हैं और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुई हैं। आलोचकों का आरोप है कि छोटे उपभोक्ताओं पर कार्रवाई ज्यादा हुई, जबकि बड़े पैमाने पर अवैध शराब तस्करी के नेटवर्क पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग पाया।
राज्य के कई जिलों में अवैध और जहरीली शराब से मौत की घटनाएं भी सामने आईं, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। इससे यह बहस और तेज हो गई है कि क्या पूर्ण प्रतिबंध की बजाय सख्त नियमन और नियंत्रित बिक्री बेहतर विकल्प हो सकता है।
सामाजिक प्रभाव: महिलाओं का समर्थन, युवाओं की चिंता
शराबबंदी लागू करते समय मुख्यमंत्री Nitish Kumar ने इसे महिलाओं के सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार का बड़ा कदम बताया था। ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिला समूहों ने इस नीति का समर्थन किया और दावा किया कि घरेलू हिंसा तथा पारिवारिक विवादों में कमी आई है।
हालांकि युवाओं और व्यापारिक वर्ग के एक हिस्से का मानना है कि प्रतिबंध के बावजूद शराब की उपलब्धता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, बल्कि यह अवैध बाजार में बदल गई है। इससे कानून-व्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों पर खतरा बढ़ा है।
राजनीतिक समीकरण और भविष्य की दिशा
शराबबंदी का मुद्दा बिहार की राजनीति में बेहद संवेदनशील है। यह मुख्यमंत्री की छवि और उनकी राजनीतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यदि इस नीति में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो उसका व्यापक राजनीतिक असर पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार तत्काल कोई बड़ा फैसला नहीं लेगी, लेकिन आंशिक संशोधन या क्रियान्वयन में सुधार की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। संभावित विकल्पों में—
- कानून में संशोधन कर छोटे मामलों में राहत
- पारंपरिक पेय पदार्थों को अलग श्रेणी में रखना
- सीमित और नियंत्रित लाइसेंस प्रणाली लागू करना
- अवैध कारोबार पर सख्त कार्रवाई