पोस्टर में कैंडिडेट प्रशांत किशोर को टोपी और गले में गमछा लेकर दिखाया गया है, जो कि उनके विरोधि निशाना साध रहा है. इसके साथ ही पोस्टर में लिखा है- ‘KC सिन्हा तो झांकी है, जमानत जब्त होना अभी बाकी है’. इसके साथ ही यह भी लिखा है- ‘वोट नहीं नोट चाहिए’.
पोस्टर में ‘जन सुराज’ की जगह ‘धन सुराज’ लिखा गया है. इससे यह पता चलता है कि पार्टी पर हमला करने के लिए किस तरह के तरीकों का उपयोग कर रही है. साथ ही, यह भी दर्शाता है कि पार्टी कैंडिडेट की छवि को और भी स्टैंडअप करने के लिए प्रयास कर रही है.
बांकीपुर उपचुनाव के दौरान पार्टियां एक-दूसरे पर हमला करने के लिए प्रयास कर रही हैं. प्रशांत किशोर का नया पोस्टर भी इसी का एक उदाहरण है. पोस्टर में कैंडिडेट को टोपी और गले में गम्छा लेकर दिखाया गया है, साथ ही हाथ में नोट की गड्डी दिखाई दे रही हैं।
बांकीपुर उपचुनाव के दौरान पार्टियां एक-दूसरे पर हमला करने के लिए प्रयास कर रही हैं. पार्टियों के द्वारा लगाए गए पोस्टर भी भड़काऊ हो रहे हैं, जो कि चुनावी दंगल को और भी गहरा बना रहे हैं.
बांकीपुर उपचुनाव में पार्टियां जीत की रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं. इसके लिए पार्टियों के द्वारा पोस्टर वॉर शुरू कर दिया गया है. प्रशांत किशोर का नया पोस्टर भी चुनावी राजनीति में मिडिया हाईलाईटेड है.
बांकीपुर उपचुनाव के दौरान पार्टियों द्वारा लगाए गए पोस्टर भड़काऊ हो रहे हैं और जनता को भड़काने के लिए प्रयास कर रहे हैं. इससे पहले भी पार्टियों ने अपने विरोधियों पर हमला किया है, लेकिन इस बार वे अपने पोस्टरों में और भी शातिर बने हुए हैं.
प्रशांत किशोर का नया पोस्टर भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पोस्टर में उन्हें सिर पर टोपी और गले में गमछा डाले हुए दिखाया गया है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक उनके विरोधियों पर तंज के रूप में देख रहे हैं। पटना में लगाए गए इस पोस्टर पर बड़ा संदेश लिखा है – ‘वोट नहीं, नोट चाहिए’, जिसने बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
इस पोस्टर के जरिए प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जन सुराज भ्रष्ट राजनीति और कथित वोट बैंक की राजनीति पर सवाल उठाने की कोशिश की है। हालांकि, विरोधी दल इसे राजनीतिक ड्रामा और चुनावी स्टंट करार दे रहे हैं।
प्रशांत किशोर का यह नया पोस्टर राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने का एक और तरीका जरूर है, लेकिन चुनावी राजनीति में बढ़ते टकराव के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता इस संदेश को किस रूप में लेते हैं। आखिरकार, चुनावी पोस्टरों और नारों से आगे बढ़कर जनता अपने मुद्दों, विकास और बेहतर नेतृत्व के आधार पर ही अपना फैसला सुनाती है।
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