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असम का पहला राज्य‑स्वामित्व उपग्रह “AssamSAT” परियोजना के चयन चरण में, डेटा‑आधारित शासन व कृषि‑आधार के

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने आज दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय अंतरिक्ष मंच के उपसमारोह में कहा कि राज्य अब उपग्रह डेटा के उपभोक्ता से एक सक्रिय भागीदार बन गया है; इस दिशा में पहला कदम ‘AssamSAT’ परियोजना है, जिसकी साझेदारी के लिये अब चयन प्रक्रिया के अंतिम चरण में प्रवेश किया गया है। उन्होंने बताया कि यह उपग्रह न केवल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में असम की स्थिति को मजबूत करेगा, बल्कि तेज़ एवं प्रमाण‑आधारित शासन में नई संभावनाएँ भी प्रदान करेगा।

मुख्यमंत्री ने इस अवसर का उपयोग असम के अंतरिक्ष‑तकनीक के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए किया। २०१० में असम ने पहली बार राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) के डेटा का उपयोग करके बाढ़ प्रबंधन प्रणाली स्थापित की थी, जिसके बाद विभिन्न कृषि‑संतुलन योजनाओं में उपग्रह‑चित्रण का उपयोग किया गया। हालांकि, अब तक असम ने केवल डेटा का उपभोग किया था; उपग्रह निर्माण में सीधे भागीदारी नहीं थी।

सरमा ने कहा कि ‘AssamSAT’ के माध्यम से असम अपनी जियोस्पेशियल आवश्यकताओं के अनुरूप एक स्वदेशी उपग्रह विकसित करेगा, जिससे राज्य के जल‑संसाधन, कृषि, आपदा प्रबंधन और शहरी नियोजन में वास्तविक‑समय डेटा उपलब्ध होगा। इस उपग्रह का मुख्य उद्देश्य निचली स्तर की प्रशासनिक इकाइयों को सटीक जानकारी प्रदान कर निर्णय‑लेने की गति बढ़ाना है।

अभी तक चार संभावित साझेदारों को तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिये आमंत्रित किया गया था। इनमें दो भारतीय निजी कंपनियां, एक अंतरराष्ट्रीय उपग्रह निर्माता और एक संयुक्त उद्यम शामिल थे। प्रस्तावों की समीक्षा एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति द्वारा की जाएगी, जो तकनीकी क्षमता, लागत‑प्रभावशीलता और स्थानीय उद्योग के साथ सहयोग को प्रमुख मानदंड मानती है।

समिति ने पिछले दो महीनों में सभी दस्तावेज़ों का विस्तृत विश्लेषण किया और आज तक के सर्वेक्षण के आधार पर तीन कंपनियों को अंतिम चरण के लिए बुलाया गया है। इस चरण में प्रत्यक्ष प्रस्तुति, प्रोटोटाइप प्रदर्शन और वित्तीय मॉडल की गहन जांच शामिल होगी। चयन प्रक्रिया को पारदर्शी रखने के लिये सभी चरणों की जानकारी सार्वजनिक वेबसाइट पर अद्यतन की जाएगी।

मुख्य निर्णय १५ अक्टूबर को असम के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के मुख्यालय में आयोजित विशेष सभा में लिया जाएगा। यदि चयनित भागीदार सफल रहा, तो अगले दो वर्षों में उपग्रह की डिज़ाइन और परीक्षण कार्य शुरू होगा, जिससे २०२७ के मध्य में प्रथम लॉन्च की योजना बन रही है।

मुख्य विपक्षी दल के नेता निरंजन दास ने इस परियोजना को ‘राज्य की तकनीकी महत्त्वाकांक्षा’ के रूप में सराहा, परन्तु उन्होंने वित्तीय जोखिमों और सार्वजनिक निधियों के उचित उपयोग पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “उपग्रह निर्माण में उच्च लागत और तकनीकी चुनौती दोनों हैं; सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि यह निवेश असम के सामान्य जनता को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचा सके।”

इसी बीच, असम के व्यापार मंडल के अध्यक्ष रजत भट्टाचार्य ने कहा कि ‘AssamSAT’ स्थानीय उद्योगों को नई तकनीकी श्रृंखला प्रदान करेगा, जिससे स्टार्ट‑अप्स और छोटे एवं मध्यम उद्यमों के लिये रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे। उन्होंने कहा, “उपग्रह से प्राप्त डेटा से कृषि की उत्पादकता बढ़ेगी, जिससे किसान की आय में सुधार होगा, और साथ ही डेटा‑सेवा कंपनियों के लिये नया बाज़ार तैयार होगा।”

राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक, डॉ. सविता कुमारी ने परियोजना के तकनीकी पहलुओं पर सकारात्मक टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “अगर असम अपना स्वयं का उपग्रह लॉन्च कर सके, तो यह न केवल राज्य के लिए बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए एक मॉडल बन जाएगा, जिससे विकेंद्रीकृत उपग्रह सेवाओं की संभावना बढ़ेगी।”

राजनीतिक रूप से इस कदम को असम सरकार की विकास एजेंडा में एक प्रमुख मील का पत्थर माना जा रहा है। यदि सफल रहा, तो यह प्रदेश के तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ाएगा और केंद्र‑राज्य सहयोग को नई दिशा देगा। आर्थिक रूप से, उपग्रह की निर्माण और संचालन में अनुमानित निवेश लगभग ४०० करोड़ रुपये बताया गया है, जिसमें निजी साझेदारियों और विदेशी तकनीकी सहयोग के माध्यम से लागत‑साझाकरण की संभावना है।

सामाजिक दृष्टिकोण से, ‘AssamSAT’ का डेटा बाढ़‑प्रबंधन, जल‑संरक्षण और सटीक कृषि में उपयोग होने से ग्रामीण इलाकों में जीवन स्तर सुधरने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक‑समय मौसम पूर्वानुमान और जल‑स्तर निगरानी से बाढ़‑प्रभावित क्षेत्रों में मानवीय सहायता का वितरण तेज़ हो सकेगा, जिससे जीवन‑हानि में कमी आ सकती है।

विज्ञान नीति विशेषज्ञ प्रो. अरविंदन मोहन ने कहा, “इस प्रकार की राज्य‑स्तरीय उपग्रह पहल अंतरिक्ष नीति में विविधता लाती है और राष्ट्रीय स्तर पर डेटा सुरक्षा एवं स्वायत्तता के प्रश्न उठाती है। असम को तकनीकी मान

Updated: August 23, 2026


Assam’s chief minister announced that the state is moving from satellite data consumer to partner, with the AssamSAT project entering its final selection phase to develop a home‑grown satellite for real‑time water, agriculture and disaster management. The initiative, backed by a mix of Indian and foreign firms and slated for a mid‑2027 launch, aims to boost governance, local industry and farmer incomes while drawing scrutiny over costs and public‑fund usage.

Assam’s leap from data‑consumer to satellite‑builder signals a bold push for “data sovereignty” that could redefine rural governance, but it risks turning a developmental ambition into a costly tech‑venture if not tightly coupled with local industry and transparent budgeting. This move may set a precedent for

अवैध प्रवासियों के खिलाफ सरकार की आक्रामक कार्रवाई

भारत सरकार ने आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और जनसांख्यिकीय संतुलन बनाये रखने के लिए अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं के खिलाफ आक्रामक अभियान शुरू कर दिया है।这个 अभियान के तहत डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट नीति लागू की जा रही है, जिसका मकसद अवैध प्रवासियों की पहचान करना, उनके फर्जी दस्तावेजों को नष्ट करना और उन्हें उनके देश वापस भेजना है।पश्चिम बंगाल में अवैध प्रवासियों को रखने के लिए विशेष होल्डिंग सेंटर्स बनाए जा रहे हैं, जहां विदेशी नागरिकों को रखा जाएगा। यह कदम देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उठाया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अवैध प्रवासी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी है।

अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सरकार ने एक विशेष रणनीति बनाई है, जिसमें डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट नीति शामिल है। इस नीति के तहत अवैध प्रवासियों की पहचान करने, उनके फर्जी दस्तावेजों को नष्ट करने और उन्हें उनके देश वापस भेजने का काम किया जाएगा। यह कदम देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखने के लिए उठाया जा रहा है।

अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सरकार ने सुरक्षा एजेंसियों को सख्त निर्देश दिए हैं। सुरक्षा एजेंसियों को अवैध प्रवासियों की पहचान करने और उन्हें उनके देश वापस भेजने का काम सौंपा गया है। इस काम में सुरक्षा एजेंसियों को राज्य सरकारों का सहयोग करना होगा।

अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सरकार ने एक विशेष टास्क फोर्स बनाई है, जो अवैध प्रवासियों की पहचान करने और उन्हें उनके देश वापस भेजने का काम करेगी। यह टास्क फोर्स सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर काम करेगी और अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने में मदद करेगी।

अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने से देश की आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी और जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखा जा सकेगा। यह कदम देश की सुरक्षा और समृद्धि के लिए जरूरी है।

अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सरकार ने सख्त कानून बनाए हैं। इन कानूनों के तहत अवैध प्रवासियों को दंडित किया जाएगा और उन्हें उनके देश वापस भेजा जाएगा। यह कदम देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उठाया जा रहा है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए राज्य सरकारों को सख्त निर्देश दिए हैं। राज्य सरकारों को अवैध प्रवासियों की पहचान करने और उन्हें उनके देश वापस भेजने का काम सौंपा गया है।

भारत सरकार की इस आक्रामक अभियान से न केवल आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि देश की जनसांख्यिकीय स्थिति पर प्रभाव डालने वाले अवैध प्रवासन से जुड़े मामलों पर भी सख्ती से कार्रवाई करने में मदद मिलेगी। सरकार का मानना है कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। हालांकि, इस तरह के अभियानों में यह भी आवश्यक है कि सभी कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया और मानवाधिकारों के निर्धारित मानकों के अनुरूप की जाए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति के अधिकार प्रभावित न हों। यह कदम देश की सुरक्षा और प्रभावी सीमा प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हाई अलर्ट पर असम, अरुणाचल में भारी बारिश के बाद आई डरावनी बाढ़; गरजती हुई बह रहीं ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियां

असम, अरुणाचल में भारी बारिश के बाद आई डरावनी बाढ़; गरजती हुई बह रहीं ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियांअसम, भारत के पूर्वी हिस्से में बाढ़ की स्थिति गंभीर होती जा रही है। अरुणाचल प्रदेश में हुई भारी बारिश और फ्लैश फ्लड के बाद, इस राज्य में आने वाले दिनों में ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों के जलस्तर में तेजी से बढ़ोतरी की आशंका है। असम सरकार ने हालात पर नजर रखते हुए उन जिलों को अलर्ट पर रखा है, जहां आने वाले दिनों में बाढ़ का खतरा सबसे अधिक है।

यह बाढ़ अरुणाचल प्रदेश के लोवर सुबनसिरी जिले के पूर्वी हिस्से से निकली है। यहां 24 घंटे की अवधि में 100 मिमी से अधिक बारिश हुई है। इससे ब्रह्मपुत्र नदी के जलस्तर में तेजी से वृद्धि हुई है और इसे असम में पहुंच रहा है। मौसम विभाग के अनुसार, आने वाले 24 घंटों में भी बारिश की संभावना है, जिससे बाढ़ का खतरा और बढ़ सकता है।

असम के कई जिलों में बाढ़ के कारण बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। जिन जिलों में बाढ़ का खतरा सबसे अधिक है, उन्हें अलर्ट पर रखा गया है। सरकार ने बाढ़ के प्रभावित लोगों की मदद के लिए त्वरित कदम उठाए हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों में खाद्य और पेयजल प्रदान किया जा रहा है।

असम सरकार ने बाढ़ प्रभावित लोगों की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए कदम उठाए हैं। सरकार ने बाढ़ प्रभावितों को 5000 का अनुग्रह भुगतान किया है। साथ ही सरकार ने बाढ़ प्रभावित इलाकों के लिए 5 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की है।

असम के अलावा, अरुणाचल प्रदेश में भी बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। यहां कई घर और किसानों की फसलें बर्बाद हो गई हैं। स्थानीय सरकार ने इस स्थिति का समन्वय करने के लिए एक आपदा के प्रतिनिधिमंडल की नियुक्ति की है।

बाढ़ के कारण असम में लोगों को असमानता के सामने-फोन सेंटर, बैंक, हॉस्पिटल, स्कूल आदि के बंद होने की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। बाढ़ के कारण असम में किसानों को अपनी फसलों का नुकसान हुआ है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई है।

असम के अलावा, अरुणाचल प्रदेश में भी बाढ़ के कारण बड़ा नुकसान हुआ है। यहां कई घर और किसानों की फसलें बर्बाद हो गई हैं। स्थानीय सरकार ने इस स्थिति का समन्वय करने के लिए एक आपदा के प्रतिनिधिमंडल की नियुक्ति की है।

बाढ़ के कारण असम में लोगों को अपने घरों से बाहर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यहां कई इलाकों में पानी की कमी हो गई है, जिससे लोगों को पानी पीने के लिए पानी के टैंकरों का इंतजार करना पड़ रहा है। सरकार ने पानी की आपूर्ति के लिए त्वरित कदम उठाए हैं।

असम के मुख्यमंत्री श्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि सरकार बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद करेगी और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर ले जाएगी। उन्होंने कहा है कि सरकार बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन कर प्रभावित परिवारों को हरसंभव सहायता प्रदान करेगी। इसके लिए राहत एवं बचाव कार्यों को तेज कर दिया गया है और प्रशासन को आवश्यक निर्देश जारी किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया कि लोगों के पुनर्वास, भोजन, चिकित्सा सुविधा और अन्य जरूरी जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार हर संभव कदम उठाएगी, ताकि प्रभावित लोगों को जल्द से जल्द सामान्य जीवन में लौटने में मदद मिल सके।

असम और अरुणाचल में भारी बारिश के बाद डरावनी बाढ़ आई है, जिससे ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियां गरजती हुई बह रही हैं। असम सरकार ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में मदद के लिए तेजी से कदम उठाए हैं, जिनमें खाद्य, पेयजल और अनुग्रह भुगतान शामिल हैं।

भारी बारिश के बाद असम और अरुणाचल में फैली हुई बाढ़ ने न केवल लोगों की जान-माल को खतरे में डाला, बल्कि आर्थिक स्थिरता को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। बाढ़ के कारण हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हो गई, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसके अलावा सड़क, पुल, बिजली और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी क्षति पहुंची है, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करने और आर्थिक गतिविधियों को पटरी पर लाने में काफी समय लग सकता है। वहीं, राहत और पुनर्वास कार्यों पर सरकार को अतिरिक्त संसाधन खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे राज्य की वित्तीय चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।

‘मियां’ मुसलमान बीजेपी के दुश्मन नहीं: हिमंत बिस्वा सरमा का बयान, चुनावी माहौल में नई बहस

असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma ने एक बार फिर राज्य की राजनीति में चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि “मियां मुसलमान भारतीय जनता पार्टी के दुश्मन नहीं हैं”, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि उन्हें “राष्ट्रीय मूल्यों को स्वीकार करना चाहिए और कुछ प्रथाओं को छोड़ना चाहिए।” यह बयान ऐसे समय आया है जब असम में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है और विभिन्न दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।

यह टिप्पणी उस लंबे विवाद का हिस्सा है जिसमें “मियां” शब्द, असम की राजनीति, और बंगाली मूल के मुसलमानों की पहचान को लेकर बहस चलती रही है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री की आलोचना की है, जबकि भाजपा का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं बल्कि राज्य की पहचान और कानून व्यवस्था की रक्षा करना है।

‘मियां’ शब्द और उसका राजनीतिक संदर्भ

असम में “मियां” शब्द आम तौर पर बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कई लोग इसे सम्मानजनक संबोधन मानते हैं, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ में यह शब्द अक्सर विवाद का कारण बन जाता है। कई मामलों में इसे अपमानजनक या राजनीतिक रूप से संवेदनशील शब्द भी माना गया है।

असम की राजनीति में यह शब्द लंबे समय से जुड़ा हुआ है क्योंकि राज्य में अवैध प्रवास, नागरिकता और जनसंख्या परिवर्तन जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। राज्य के कई नेताओं ने इन मुद्दों को चुनावी राजनीति से भी जोड़ा है।

सरमा का बयान: “दुश्मन नहीं, लेकिन…”

मुख्यमंत्री सरमा ने अपने हालिया बयान में कहा कि भाजपा “मियां मुसलमानों” को दुश्मन नहीं मानती। उन्होंने यह भी कहा कि समुदाय के लोग अगर राष्ट्रीय मूल्यों और कानून का पालन करते हैं, तो उनके साथ कोई समस्या नहीं है।

हालांकि उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि कुछ गतिविधियों और राजनीति के तौर-तरीकों को बदलने की जरूरत है। उनके अनुसार, असम में सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए सभी समुदायों को राज्य की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान का सम्मान करना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह बयान दो संदेश देने की कोशिश करता है—

  1. भाजपा मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नहीं है।
  2. लेकिन राज्य की राजनीति में पहचान और नागरिकता के मुद्दों पर उसकी सख्त स्थिति बनी रहेगी।

पहले भी विवादों में रहे हैं ऐसे बयान

मुख्यमंत्री सरमा पहले भी “मियां मुसलमानों” को लेकर दिए गए बयानों के कारण विवादों में रहे हैं। हाल के महीनों में उन्होंने कहा था कि वे “मियां लोगों को परेशान करने” की बात खुलकर कहते हैं और यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। इस बयान पर विपक्ष ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी।

कुछ आलोचकों का कहना है कि ऐसे बयान साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा सकते हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि मुख्यमंत्री केवल अवैध प्रवास और कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं।

विपक्ष की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री के बयान पर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विपक्ष का कहना है कि इस तरह की भाषा समाज को विभाजित करती है और चुनावी लाभ के लिए धार्मिक पहचान को मुद्दा बनाया जा रहा है।

कई विपक्षी नेताओं का आरोप है कि राज्य सरकार की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा ध्रुवीकरण पर आधारित है। उनके अनुसार, चुनाव के नजदीक आते ही ऐसे बयान ज्यादा सामने आते हैं।

असम की राजनीति में पहचान का मुद्दा

असम की राजनीति में पहचान, भाषा और प्रवास के मुद्दे दशकों से महत्वपूर्ण रहे हैं। 1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन भी मुख्य रूप से अवैध प्रवास के खिलाफ था। इस आंदोलन ने राज्य की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया और बाद में कई राजनीतिक दलों की रणनीतियों का आधार बना।

आज भी यह मुद्दा राज्य के राजनीतिक विमर्श में प्रमुख स्थान रखता है। कई दल इसे असमिया पहचान की रक्षा के रूप में पेश करते हैं, जबकि दूसरे दल इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों के नजरिए से देखते हैं।

चुनावी माहौल और बयानबाजी

2026 में होने वाले असम विधानसभा चुनावों के कारण राज्य में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आगामी चुनाव में 126 सीटों पर मतदान होना है और मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस-नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के बीच माना जा रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव के दौरान पहचान और धर्म से जुड़े मुद्दे अक्सर राजनीतिक बहस का केंद्र बन जाते हैं। इसलिए मुख्यमंत्री का यह बयान भी चुनावी रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।

भाजपा की रणनीति

भाजपा लंबे समय से असम में राष्ट्रीय सुरक्षा, अवैध प्रवास और सांस्कृतिक पहचान को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाती रही है। पार्टी का दावा है कि उसकी नीतियों का उद्देश्य राज्य की जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक संरचना की रक्षा करना है।

मुख्यमंत्री सरमा ने कई बार कहा है कि उनकी सरकार अवैध प्रवास के खिलाफ कड़े कदम उठाएगी और कानून व्यवस्था को मजबूत बनाएगी। भाजपा का यह भी कहना है कि वह सभी धर्मों और समुदायों के साथ समान व्यवहार में विश्वास रखती है।

समुदाय की प्रतिक्रिया

मियां मुसलमानों के बीच इस बयान को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री का यह बयान तनाव कम करने की कोशिश है। वहीं कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि ऐसे बयान तब तक पर्याप्त नहीं होंगे जब तक सरकार की नीतियों में भी स्पष्ट बदलाव न दिखे।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान का प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहता। यह सामाजिक संबंधों और समुदायों के बीच विश्वास को भी प्रभावित करता है।

असम जैसे बहु-सांस्कृतिक राज्य में जहां कई भाषाएं, धर्म और जातीय समूह रहते हैं, वहां राजनीतिक नेताओं के बयान समाज में व्यापक असर डाल सकते हैं।

बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों पर नकेल: नितिन नबीन ने किया असम मॉडल लागू करने का एलान

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एक रैली को संबोधित करते हुए बड़ा एलान किया। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता में आती है, तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को राज्य से बाहर निकालने के लिए असम का मॉडल लागू किया जाएगा। असम में ‘पहचानो (डिटेक्ट), नाम हटाओ (डिलीट) और वापस भेजो (डिपोर्ट)’ की नीति पर काम किया गया है, जिसका उद्देश्य अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें राज्य से बाहर निकालना है।

नितिन नबीन ने मालदा में परिवर्तन यात्रा की शुरुआत करते हुए कहा कि भाजपा अगर राज्य की सत्ता में आती है, तो इस्लामपुर का नाम बदलकर ‘ईश्वरपुर’ कर देगी। उन्होंने दावा किया कि निर्वाचन आयोग ने बंगाल में 50 लाख से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठियों को मताधिकार से वंचित कर दिया है। उन्होंने कहा कि अगर निर्वाचन आयोग 50 लाख से अधिक बांग्लादेशियों के नाम नहीं हटाता, तो बंगाल के लोगों के लिए केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ घुसपैठियों को मिलता।

नितिन नबीन ने कहा कि भाजपा ने हाल में बिहार में सरकार बनाई है और असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने के लिए ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ का मॉडल अपना रही है। उन्होंने कहा कि जहां भी ये विदेशी लोग हमारे अपने नागरिकों के अधिकारों को छीन रहे हैं, हम वहां इसे लागू करेंगे। उन्होंने पूरे भाषण में इस्लामपुर के लोगों को ‘ईश्वरपुर के लोग’ कहकर संबोधित किया और कहा कि भाजपा इस जगह का नाम बदलकर ईश्वरपुर करने के सपने को पूरा करेगी।