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ध्वस्त हो चुकी है बिहार की नौकरशाही

क्या ये मान लिया जाये कि बिहार में नौकरशाही पूरी तरह से ध्वस्त हो गया या फिर नौकरशाही में आने की जो प्रक्रिया है उस प्रक्रिया में बड़े बदलाव की जरूरत है । यह सवाल आज मैं इसलिए कर रहा हूं कि पांच वर्ष बाद एक बार फिर शुरू हुए जनता के दरबार में सीएम कार्यक्रम के दौरान जिस तरीके की शिकायत आ रही हैं उससे तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि बिहार की नौकरशाही पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है । 

 जनता के दरबार में मुख्यमंत्री कार्यक्रम 2007 से  2014 के दौरान शायद ही ऐसा कोई दरबार रहा हो जिसमें मैं एक पत्रकार के रूप में शामिल नहीं हुआ हूं।उस कानून का भी मैं साक्षी हूं जिसके आधार पर जनता के दरबार में मुख्यमंत्री कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया था । जी है मैं बात कर रहा हूं राइट टू सर्विस एक्ट की जिसका रोजाना आज भी सूचना भवन में 50 से अधिक कर्मचारी हर शिकायत और उसके फैसले पर नजर रखते हैं ।

लेकिन यहां भी समस्या वहीं है जनता की शिकायत पर अधिकारी जो फैसला सुनाते हैं उन फैसलों को लागू करने वाले अधिकारी लागू नहीं कराते हैं ऐसे लाखों आदेश की कॉपी पंचायत से लेकर प्रखंड और जिला के दफ्तर में धूल फांक रहा है यह एक्ट भी नौकरशाही का भेट चढ़ गया ।

 इस बार जब से जनता के दरबार में मुख्यमंत्री कार्यक्रम का आयोजन किया गया है देखिए किस तरह की शिकायत आ रही है ।   कल अल्पसंख्यक कल्याण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, कला संस्कृति एवं युवा, वित्त, श्रम संसाधन व सामान्य प्रशासन पिछड़ा एवं अति पिछड़ा कल्याण, अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण के साथ मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य व समाज कल्याण विभाग से जुड़े 147 मामलों आया हुआ था जिसमें   समस्तीपुर से आये एक छात्र ने मुख्यमंत्री से गुहार लगाते हुए कहा कि वर्ष 2017 में ही मैट्रिक की परीक्षा पास की लेकिन 10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि नहीं दी गई है।

इसी तरह पिछले दरबार में  नवादा से चलकर आई 17 वर्षीय ईशु कुमारी कहती हैं, “हम मुख्यमंत्री बालिका प्रोत्साहन राशि को लेकर यहां आए हैं. हम साल 2019 में मैट्रिक और साल 2021 में इंटर फर्स्ट डिविजन से पास किए लेकिन प्रोत्साहन राशि नहीं मिली।प्रोत्साहन राशि का पैसा हर जिले में उपलब्ध है लेकिन सरकार के इस योजना का लाभ बच्चों को नहीं मिल रहा है।     इसी तरह शिवहर से आए एक युवक ने मुख्यमंत्री से फरियाद करते हुए कहा कि मैंने वर्ष 2016 में मैट्रिक की परीक्षा पास की लेकिन मेरे सर्टिफिकेट पर मेरी तस्वीर की बजाए एक लड़की की तस्वीर लगा दी गई है।

सर्टिफिकेट पर फोटाे सुधार के लिए बिहार बोर्ड में आवेदन भी किया, लेकिन अबतक सुधार नहीं हुआ जिस वजह से इसकी पढ़ाई बाधित हो गयी है।अंक पत्र में सुधार ,नाम में सुधार जैसी समस्या आम है लेकिन इसमें सुधार हो इसके लिए आपको वर्षो बोर्ड के दफ्तर का चक्कर लगाना पड़ेगा ।हर जिला में आंगनबाड़ी केंद्र में काम करने वाली सेविका और सहायिका के मानदेय के लिए राशि उपलब्ध है लेकिन दो वर्ष से मानदेय नहीं मिल रहा है ।

पीडीएस से अनाज नहीं मिल रहा है ,डॉक्टर अस्पताल नहीं आ रहे हैं  इसी तरह सीएम नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘सात निश्चय योजना में काम की गुणवत्ता और सात निश्चय योजना का काम पूरा नहीं होने साथ ही ‘स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना का लाभ मिलने वाले छात्रों को बैंक द्वारा परेशान किये जाना और प्रधानमंत्री आवास योजना के निर्माण में गड़बड़ी और आवंटन को लेकर हेराफेरी, उद्योग विभाग से अनुदान समय पर नहीं मिल रहा है, बिजली बिल में सुधार नहीं हो रहा है जैसे मामले आ रहे हैं ,जमीन और पुलिस से जुड़े से जुड़े मामले पर चर्चा करना ही बेमानी है वहां तो और स्थिति खराब है हर दिन नये प्रयोग हो रहे हैं और उस प्रयोग का पलीता लगाने के लिए पूरा सिस्टम मानो इन्तजार करता रहता है।

   ये ऐसी समस्या है जिसका समाधान ऑन स्पॉट हो सकता है  लेकिन इसके लिए लोगों को सीएम से मिलना पड़ रहा। मतलब सिस्टम गैर जवाबदेह है किसकी क्या जिम्मेदारी है या तो तय नहीं है या फिर तय है तो उसका कोई हिसाब लेने वाला नहीं है । इस विफलता को आप क्या कहेंगे जबकि सबको पता है कि बीमारी क्या है, ऐसे में आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र का स्वरूप क्या होगा कहना मुश्किल है क्यों कि पब्लिक अब पहले से ज्यादा सजग हो गया है अधिकार क्या है ये समझ में आने लगा है, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत बढ़ती जा रही है । बस समस्या यह है कि हम अपना प्रतिनिधि कैसे चुने इसको लेकर समझ अभी भी 20वीं सदी वाला ही है ।

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