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सूर्य भगवान की प्रतिमा की स्थापना को लेकर कलश यात्रा

जहानाबाद । जिले के घोसी गांव में सूर्य भगवान का मंदिर का निर्माण हुआ है इस मंदिर में सुय भगवान की प्रतिमा की स्थापना की जानी है। जिसके लिए गुरुवार को सुबह बड़ी संख्या में पुरुष एवं महिलाएं कलश यात्रा निकाला गया ।

घोसी गांव से चलकर फल्गु नदी से जल भरने के लिए बड़ी संख्या में पुरुष एवं महिलाएं इस कलश यात्रा में शामिल हुए घोसी बाजार होते हुए कलश यात्रा फल्गु नदी तक जाएगा। और वहां से जल लेकर घोसी गांव सूर्य मंदिर के प्रांगण में संपन्न किया जाएगा। इस कलश यात्रा में बैंड बाजे के साथ घोड़े इस सवारी को भी शामिल किया गया है।

घोसी गांव में यह कार्यक्रम 4 दिनों तक चलेगा 8 तारीख को भंडारा का आयोजन किया जाएगा । इस कार्यक्रम में बड़े-बड़े साधु महात्मा शामिल हो रहे हैं। इसमें प्रवचन का भी आयोजन किया जाएगा जिस में शामिल होकर लोग साधु महात्मा के मधुर वाणी के वचन सुनकर लोग लाभान्वित होंगे ।

ज्ञात हो कि सूर्य मंदिर बन जाने से छठ व्रतियों को काफी फायदा होगा लोग भगवान सूर्य के आराधना करने के लिए दूरदराज जाना पड़ता था। लेकिन घोसी गांव में पोखर के किनारे सूर्य मंदिर के निर्माण होने से आसपास के लोग को सूर्य भगवान की आराधना करने में काफी सुविधा होगी सूर्य भगवान का प्रतिमा स्थापना के कार्यक्रम प्रारंभ होते ही पूरे गांव में भक्ति की बयार बहने लगी है। गांव वासियों खुशी का इजहार करते हुए कहा कि आज हम लोगों के लिए अत्यंत खुशी का पल है।

छठ पर्व में सूर्य भगवान की आराधना करने के लिए दूरदराज जाना पड़ता था ।लेकिन मंदिर के निर्माण एवं सूर्य भगवान की प्रतिमा स्थापित होने से हम लोगों को अब कहीं दूर दराज छठ करने के लिए नहीं जाना पड़ेगा ।और गांव में ही छठ पूजा की आयोजन किया जाएगा इस कलश यात्रा में ढोल नगाड़े के साथ घुड़सवारी करते हुए जय श्रीराम के नारे लगाते हुए पुरुष एवं महिलाएं फल्गु नदी की पर जा रहे हैं इस कलश यात्रा से पूरा घोसी बाजार पूरा गांव एवं इलाका भक्ति में हो गया है।

सभी लोग अपने माथे पर कलश रखकर जय श्री राम एवं सूर्य भगवान की जय कार लगाते हुए इस कलश शोभायात्रा में शामिल हुए हैं।

Bihar News : राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री इस्कॉन मंदिर के लोकार्पण कार्यक्रम में हुए शामिल

पटना 03 मई 2022 : राज्यपाल श्री फागू चौहान एवं मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार आज इस्कॉन मंदिर के लोकार्पण कार्यक्रम में शामिल हुए।

मुख्यमंत्री का स्वागत इस्कॉन मंदिर प्रबंधन द्वारा फूल माला एवं अंगवस्त्र पहनाकर तथा प्रतीक चिंह भेंटकर किया गया।

मंदिर में विधिवत पूजा अर्चना एवं राधा कृष्ण की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के बाद इसे आमलोगों के दर्शनार्थ खोल दिया गया। मंदिर के पट खुलने के पश्चात् मुख्यमंत्री ने आरती पूजन कर राज्य की सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना की।

कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री श्री अश्विनी कुमार चौबे, बिहार विधानसभा अध्यक्ष श्री विजय कुमार सिंहा, शिक्षा मंत्री श्री विजय कुमार चौधरी, भवन निर्माण मंत्री श्री अशोक चौधरी, विधायक श्री नंदकिशोर यादव, विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आर०एन० सिंह, इस्कॉन के जय पताका स्वामी गुरू महाराज, लोकनाथ स्वामी महाराज, गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज, महाविष्णु स्वामी महाराज, भक्त पुरुषोत्तम स्वामी महाराज, पटना इस्कॉन के अध्यक्ष कृष्ण कृपा दास सहित अन्य संतगण, मुख्यमंत्री के अतिरिक्त परामर्शी श्री मनीष कुमार वर्मा, बिहार राज्य नागरिक परिषद् के पूर्व महासचिव श्री अरविंद कुमार सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति एवं श्रद्धालु उपस्थित थे।

क्यों याद किये जाते हैं वीर कुँवर सिंह को

बाबू कुँवर सिंह का विजयोत्सव — 23 अप्रैल

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में भाग लेकर बिहार सहित पूरे भारत के नाम को रौशन करने वाले जगदीशपुर के 80 वर्षीय राजा बाबू कुँवर सिंह थे। एक तरफ दिल्ली में अंतिम मुगल सम्राट 80 वर्षीय बहादुरशाह जफर अपने काँपते हुए हाथों से पत्र लिखकर समस्त भारत के देशी नरेशों को संग्राम में भाग लेने के लिए आह्वान कर रहे थे तो दूसरी तरफ करीब उसी उम्र के वीर बांकुरा बाबू कुँवर सिंह तलवार हाथ में लेकर राजपूती शान का प्रदर्शन करते हुए अपने जनपद सहित सभी देशवासियों को कुर्बानियों के लिए तैयार कर रहे थे।

मेरठ, दिल्ली एवं देश के अन्य भागों की क्रांति दानापुर छावनी में भी सुनाई पड़ रही थी। कमिश्नर टेलर दानापुर के सैनिकों को शस्त्र-विहीन करना चाहता था जिससे हिंदू-मुस्लिम सैनिक उत्तेजित हो उठे और 24 जुलाई 1857 को बगावत करते हुए अपनी वर्दी उतार कर आरा के लिए चल पड़े । दानापुर छावनी की तीन पालटनों (7, 8 एवं 40) का विद्रोह ब्रिटिश सत्ता के लिए खुली चुनौती थी । दानापुर के क्रांतिकारी सेना के जगदीशपुर पहुंचते ही बूढ़ कुँवर सिंह की रगों में जवानी का नशा चढ़ गया । अपने महल से निकलकर उन्होंने क्रांतिकारी सेना का नेतृत्व उसी तरह ग्रहण किया जैसे 11 मई 1857 को मेरठ से आए दो हजार घुड़सवार सैनिकों का नेतृत्व 80 वर्षीय मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर ने किया था । दानापुर छावनी के विद्रोही सेना के साथ कुँवर सिंह आरा पहुंचे और जेलखाने के कैदियों को रिहा कर अंग्रेजी दफ्तरों को ध्वस्त कर दिया ।

महाराजा कॉलेज परिसर में अवस्थित छोटे से किले- ‘आरा हाउस’ को घेरकर उसमें छिपे अंग्रेजों और सिक्ख सेनाओं को हथियार डालने के लिए उन्होंने बाध्य किया । तीन दिनों तक आरा हाउस का युद्ध चलते रहा । जब किले में पानी की कमी हुई तब सिक्ख सैनिकों ने 24 घंटे के अंदर एक नया कुंआ खोदकर तैयार कर लिया । उस समय आरा हाउस (ब्वायर कोठी) के अंदर आधुनिक हथियारों से सुसज्जित 50 सिक्ख एवं 16 अंग्रेज सैनिक थे जो इसमें शरण लिए अंग्रेजों एवं उनके परिवारों की रक्षा के लिए तैनात थे । आरा हाउस (ब्वायल कोठी) की लड़ाई ही बाबू साहेब की अंग्रेजी सल्तनत के साथ आरा की लड़ाई थी और यह लड़ाई करीब एक सप्ताह चली ।

वीर कुँवर सिंह
वीर कुँवर सिंह

अब पूरे आरा पर बाबू कुँवर सिंह का शासन हो गया और वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के 5000 क्रांतिकारी सिपाहियों के सर्वमान्य नेता तथा समस्त भोजपुरी भाषी जनता के कंठहार बन गए । जनता ने ‘तेगवा बहादुर’ की पदवी से उनका यशोगान किया । बसंतकाल में आज भी भोजपुरी भाषी अपने झोपड़ों-चौपालों और गांव के खेत-खलिहानों में गा उठते हैं–

“बाबू कुंवर सिंह ‘तेगवा बहादुर’
बंगला में उड़ेला अबीर”।

कुँवर सिंह के नेतृत्व में ब्रिटिश सल्तनत के विरूद्ध में आरा का यह विद्रोह अब पूरे शाहाबाद क्षेत्र में राष्ट्रीय क्रांति का रूप ले चुका था । अंग्रेजों के लिए आरा नगर सैनिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण स्थल था । वे हर हालत में आरा को बचाना चाहते थे । परिणामस्वरुप, आरा हाउस में घिरे अंग्रेजों की प्राण रक्षा के लिए 500 यूरोपियन गोरे सैनिकों एवं सिक्खों की एक टुकड़ी के साथ कैप्टन डनवर 29 जुलाई 1857 को दानापुर छावनी से आरा के लिए रवाना हुआ । आरा पहुंचने से पूर्व ही रात में बाबू कुँवर सिंह के सैनिकों से डनवर की फौज का मुकाबला हुआ जिसमें 500 सैनिकों में से सिर्फ 50 घायल होकर और केवल तीन जीवित अधिकारी दानापुर पहुंचे। कैप्टन डनवर सहित अन्य सभी सैनिक मारे गए ।

कैप्टन डनवर की पराजय के बाद आरा पर पूर्ण रूप से बाबू कुँवर सिंह का अधिकार हो गया और पूरा शाहाबाद स्वतंत्र हो गया । अब बाबू कुँवर सिंह ने आरा में पूर्वी पश्चिमी थाना स्थापित कर गुलाम महिया को दोनों थाने का मजिस्ट्रेट नियुक्त किया । मिल्की मुहल्ले के शेख मुहम्मद अजीमुद्दीन पूर्वी थाने के जमादार नियुक्त किए गए। दीवान शेख अफजल के दोनों पुत्र तुराव अली एवं खादिम अली इन थानों के कोतवाल बनाए गए ।

बीबीगंज की लड़ाई– कैप्टन डनवर के मारे जाने के समाचार से मेजर विंसेंट आयर 2 अगस्त 1857 को आरा की ओर कूच कर ही रहा था कि बाबू कुँवर सिंह के सैनिकों के साथ बीबीगंज में उसका भीषण संग्राम हुआ। अंततः मेजर आयर 3 अगस्त 1857 को आरा पहुंचकर कुँवर सिंह के कब्जे से आरा को मुक्त कराया ।

उसके बाद मेजर आयर की विशाल सेना का मुकाबला दुलौर में बाबू कुँवर सिंह के सैनिकों के साथ हुआ । 12 अगस्त को मेजर आयर की सेना जगदीशपुर पहुंची जहाँ कुँवर सिंह के साथ कई दिनों तक संग्राम होता रहा। अंततः मेजर आयर ने 14 अगस्त को जगदीशपुर गढ़ में आग लगा दी, सामान्य लोगों के मकान ध्वस्त कर बड़े पैमाने पर जगदीशपुर के आम लोगों की हत्या कर दी । शिवमंदिर का भी विनाश करते हुए उसने गर्व से कहा, “मैंने नए हिंदू मंदिर को नष्ट इसलिए किया, क्योंकि ब्राह्मणों ने भी कुँवर सिंह को युद्ध के लिए प्रोत्साहित किया था” (जी. डब्ल्यू फॉरेस्ट, ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्यूटिनी, भाग-3, पृष्ठ 455)। उल्लेखनीय है कि दुलौर से जगदीशपुर जाने के क्रम में मेजर आयर ने रास्ते में आतंक मचाते हुए मीलों तक घायल लोगों को सड़क के किनारे पेड़ों पर टांग-टांग कर फांसी देकर लटका दिया । जो भी विप्लवी दिखाई पड़ा, उसे मार डाला गया । कड़ी शराब पीकर अंग्रेजों ने एसे राक्षसी कार्य किया (मार्टिन, इंडियन एम्पायर, भाग-2, पृ 406)। इसके बाद कैप्टन लाॅ इस्ट्राजे ने बाबू कुँवर सिंह का जितौरा गढ़ नष्ट कर दिया । लेफ्टिनेंट सैक्सन ने कुँवर सिंह के दलीपपुर एवं मीठहां के मकानों को भी नष्ट कर दिया । दानापुर छावनी के 40 नंबर पल्टन के बचे 100 सैनिकों को संगीनों और गोलियों से उड़ा दिया गया। गुलाम महिया, अब्बास अली और वन्दे अली को क्रांति के असफल होने पर गोपाली चौक पर फांसी दी गई । भेखू जोलहा, चकवरी कहार भी कुँवर सिंह के समर्थक होने के चलते मारे गए ।

बाबू कुँवर सिंह का जगदीशपुर महल सहित पूरा जगदीशपुर पूर्ण रूप से नष्ट हो गया । अंग्रेजों द्वारा जगदीशपुर गढ़ पर कब्जा के बाद बाबू कुँवर सिंह ने महल की स्त्रियों और 12 सौ सैनिकों के साथ जगदीशपुर से निकलकर अन्यत्र मोर्चाबंदी कर अंग्रेजों से बदला लेना चाहा । अंग्रेजों की विशाल सेना के चलते भले जगदीशपुर पर उनका कब्जा हुआ हो, लेकिन अत्यल्प साधनों के बावजूद मात्र जन-समर्थन के बल पर आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित ब्रिटिश सेना का मुकाबला जिस रूप में कुँवर सिंह ने किया, वह स्वाधीनता-संग्राम में स्वर्णाक्षरों में अंकित है । जगदीशपुर की पराजय के पश्चात बाबू कुँवर सिंह अपने समर्थकों एवं सिपाहियों के साथ सासाराम की पहाड़ियों की ओर चल पड़े, जहाँ उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ भावी संग्राम की योजना बनाकर स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी को प्रज्वलित रखा । स्वतंत्रता आंदोलन के बाबू कुँवर सिंह प्रथम नायक बने जिन्होंने बहादुरशाह जफर के सपने को साकार किया । उल्लेखनीय है कि अंग्रेजी सेना द्वारा गिरफ्तार हुए मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर ने मेजर हडसन को ललकारते हुए कहा था,

“ग़ज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की,
तख्त ये लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।”

आरा (जगदीशपुर) में अंग्रेजों के साथ बाबू कुँवर सिंह के युद्ध का प्रभाव मुजफ्फरपुर, गया, संथाल परगना, हजारीबाग, चतरा, सिंहभूमि, पलामू तथा छपरा में जबरदस्त दिखाई दिया ।

बाबू कुँवर सिंह का विजय-अभियान-‘विजयोत्सव’— अपने साथियों एवं समर्थकों के अदम्य उत्साह और शौर्य से उत्साहित बाबू कुँवर सिंह का नया विभामय रूप भारतीय इतिहास में प्रकट हुआ । जगदीशपुर के पतन के बाद उनका क्षात्र तेज उमड़ पड़ा और वे अब पूरी भारतीय राष्ट्रीयता के अग्रदूत बनकर विदेशी सत्ता को मिटाने के लिए कृतसंकल्प हो गए। सासाराम के शाह कबीरूद्दीन ने अंग्रेजों की सहायता में बाबू कुँवर सिंह का जबरदस्त विरोध करते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोकना चाहा । बाबू कुँवर सिंह 26 अगस्त 1857 को रोहतास छोड़ते हुए अपने हजारों अनुयायियों के साथ आगे बढ़ते रहे । मिर्जापुर जाने के क्रम में उन्होंने जी. टी. रोड पर अधिकार किया । मिर्जापुर में बाबू कुँवर सिंह का अधिक प्रभाव था। घोरावत, शाहरोत होते हुए 30 अगस्त 1857 को कुँवर सिंह नेवारी और 9 सितंबर को 600 सैनिक और 5000 लोगों के साथ कटरा पहुंचे । 10 सितंबर 1857 को कुँवर सिंह ने रीवां में प्रवेश किया जहाँ हस्मत अली एवं हरचन्द्र राय ने उनका भरपूर सहयोग किया । रीवां के बाद बाबू कुँवर सिंह बांदा गए जहाँ के नवाब ने उनकी भरपूर सहायता की । 20 अक्टूबर को उनकी सेना कालपी पहुंची । 21 नवम्बर को वे ग्वालियर की क्रांतिकारी सेना, देशी सेना तथा अपने समर्थकों के साथ कानपुर पहुँचे । कानपुर के बाद अपनी सेना के साथ वे लखनऊ के लिए रवाना हुए जहाँ उनका स्वागत किया गया । लखनऊ में अवध के नवाब ने उनकी सहायता करते हुए उन्हें आजमगढ़ की ओर जाने के लिए शाही फरमान दिया । 15 अगस्त 1857 से 10 फरवरी 1858 के दौरान बाबू कुँवर सिंह ने स्वाधीनता की लड़ाई जारी रखी।

मिलमैन तथा डेम्स की पराजय — 22 मार्च 1858 को आजमगढ़ से 25 मील दूर अतरौलिया नामक स्थान पर कुँवर सिंह ने मिलमैन की विशाल सेना को तथा 28 मार्च 1858 को कर्नल डेम्स को पराजित कर आजमगढ़ पर अधिकार किया ।

जगदीशपुर की ओर

अब वे अपनी पैतृक रियासत जगदीशपुर को भी स्वतंत्र करना चाहते थे । इसी बीच उन्होंने लुगार्ड एवं डगलस को पराजित करते हुए 22 अप्रैल 1858 को जब बलिया के शिवपुर घाट पर गंगा पार कर रहे थे तब उनकी भुजा में गोली लगी जिसे काटकर उन्होंने गंगा में फेंक दिया । सावरकर ने कहा है कि वीरत्व की यह चेतना स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास में अविस्मरणीय बनी रहेगी । 22 अप्रैल 1858 को बाबू कुँवर सिंह 1000 पैदल सैनिकों एवं घुड़सवारों के साथ जगदीशपुर महल पहुंच गए । अपनी कटी हुई बांह तथा चोटिल जांघ के बावजूद उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध कर अपनी मातृभूमि जगदीशपुर में अपने अपूर्व रण कौशल का प्रदर्शन किया । 23 अप्रैल को जगदीशपुर में कैप्टन लीग्रैण्ड की सेना से बाबू कुँवर सिंह की सेना का मुकाबला हुआ और अंग्रेजों की पराजय के साथ-साथ कैप्टन लीग्रण्ड भी युद्ध में मारा गया । युद्ध में अंग्रेजों की पराजय के बाद प्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स बाल ने युद्ध में सम्मिलित एक अंग्रेज ऑफिसर के लेख को उद्धृत करते हुए लिखा है, “वास्तव में इसके बाद जो कुछ हुआ, उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है । युद्ध का मैदान छोड़कर हमने जंगल में भागना शुरु किया…. अफसरों की आज्ञाओं की किसी ने परवाह नहीं की । चारों ओर आहों और रोने के सिवा कुछ नहीं था । मार्ग में अंग्रेजों के गिरोह के गिरोह गर्मी से गिरकर मर गए । अस्पताल पर कुँवर सिंह ने पहले ही कब्जा कर रखा था । 16 हाथियों पर सिर्फ हमारे घायल साथी लदे हुए थे….। हमारा इस जंगल में आना ऐसी ही हुआ जैसा पशुओं का कसाई खाना में जाना । हम वहाँ केवल बध होने के लिए गए थे।”

लीग्रैण्ड की पराजय के बाद 25 अप्रैल 1858 को वीर बांकुड़े बाबू कुँवर सिंह ने अपने ध्वस्त पैतृक महल में अंतिम सांस लेकर भारतीय स्वतंत्रता के लिए युवा पीढ़ी को बड़ा संदेश दिया । विनायक दामोदर सावरकर ने लिखा है, “क्या कोई इससे भी पावन मृत्यु है, जिसकी अपेक्षा कोई राजपूत करेगा ।” सुंदरलाल ने लिखा है, “वीर कुँवर सिंह की मृत्यु के समय स्वाधीनता का ‘हरा ध्वज’ उनकी राजधानी पर फहरा रहा था।”

पराधीन भारत को ब्रिटिश सत्ता के बंधन से मुक्त करने का जो अदम्य संकल्प वृद्धावस्था में बाबू कुँवर सिंह ने लिया था, वह भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है । 1857 के आंदोलन के अविस्मरणीय अनेक योद्धाओं में बहादुरशाह जफर, नाना साहेब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई आदि का अंत वीर बांकुड़े बाबू कुँवर सिंह जैसा सुखद नहीं था ।

23 अप्रैल 1858 भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम ‘विजयोत्सव दिवस’ है जिसका उदाहरण विश्व इतिहास में नहीं है । अपना सर्वस्व बलिदान कर अंग्रेजों द्वारा ध्वस्त जगदीशपुर महल पर पुनः विजय पताका फहराकर उसमें अंतिम साँस लेना उनके अदम्य उत्साह एवं संकल्प का परिचायक है । आजमगढ़ से गंगा पार करने तक तथा लीग्रैण्ड के साथ उनकी युद्ध की समीक्षा करते हुए भले उन्हें ‘गुरिल्ला युद्ध का अप्रतिम योद्धा’, ‘शाहाबाद का शेर’, ‘बिहार का स्वाभिमान’ तथा ‘तेगवा बहादुर’ कहा गया हो, लेकिन सही अर्थ में वे समस्त भारतवासियों के लिए प्रेरणास्वरूप हैं । जहाँ बाबू कुँवर सिंह देश के स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में देश का गौरव बढ़ा रहे हैं, वहाँ 23 अप्रैल का विजयोत्सव उनके शौर्य एवं बलिदान की गौरवमयी गाथा से देशवासियों को उत्प्रेरित कर रहा है । वे सिर्फ जगदीशपुर, बिहार के ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए मान, अभिमान और स्वाभिमान के प्रतीक हैं । उन्होंने समाज के सभी वर्गों के साथ मिलकर 1857 में अंग्रेजों से युद्ध किया था । देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान देने वाले वीर स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने आजादी के 75वें वर्ष को बाबू कुँवर सिंह के शौर्य के प्रतीक 23 अप्रैल को ‘अमृत महोत्सव’ के रूप में मना कर ‘तेगवा बहादुर’ बाबू कुँवर सिंह को सर्वोत्तम श्रद्धांजलि तो दिया ही है, वीरंगना रानी लक्ष्मीबाई की जयंती को ग्वालियर में ‘अमृत महोत्सव’ का दर्जा देकर अपने राजधर्म का अनुपालन भी किया है, जिनके बारे में सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है–

“बुंदेले हरबोलों के मुंह,
हमने सुनी कहानी थी ।
खुब लड़ी मर्दानी वह तो
झांसी वाली रानी थी ।”

पेड़ के अंदर से निकली मूर्तियां, स्थानीय लोग बताते हैं सैकड़ों साल पुरानी

जीवन के अनुभवों के आधार पर आस्था निर्मित होती है। आम इंसान उसी में विश्वास कर लेता है, जिसके विषय में पूर्वज उसे सुनाते हैं। विश्वास मनुष्य की मूल प्रकृति है, जबकि आस्था उसके संस्कारों का परिणाम होता है।

आस्था और विश्वास का एक ऐसा ही पेड़ है, जहानाबाद के रतनी प्रखंड में जहां दूर दूर से पूजा करने लोग आते हैं। जहानाबाद से 20 किलोमिटर जिला का सबसे दक्षिणी इलाका रतनी फरीदपुर। इसी प्रखंड में है कंटाही बिगहा। इस गांव का एक बरगद का पेड़ लोगों के लिए आस्था का केंद्र है। पेड़ के अंदर पत्थर की आकृतियां हैं। जिसकी पूजा करने लोग दूर दूर से आते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि बरगद का पेड़ सैकड़ों साल पुराना है। जिसके अंदर शिव परिवार की मूर्तियां हैं।

महादेव शिव शंकर के दो रूपों में पूजा की जाती है। एक मूर्ति रूप में दूसरी शिवलिंग के रूप में। उनके मंदिर शहर, गांव और कस्बे हर जगह मिलेंगे। वैसे तो दोनो स्वरूपों की पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है लेकिन शिवलिंग की पूजा सर्वश्रेष्ठ होती है।
कंटाही बिगहा में भी आस्थावान अपनी मन्नत पूरी होने पर पहुंचते हैं। और शिवलिंग के साथ ही पूरे शिव परिवार की पूजा करते हैं।

विश्व विरासत दिवस पर बिहार के पारंपरिक कलाओं के प्रशिक्षण के लिए बिहार संग्रहालय में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया

यह कार्यशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पटना मंडल, बिहार पुराविद परिषद्, फेसेस पटना और बिहार म्यूजियम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। कार्यशाला में पटना विमेंस कॉलेज, नोट्रे डेम अकैडमी, इंटरनेशनल स्कूल, रेडियंट इंटरनेशनल स्कूल, केंद्रीय विद्यालय नंबर-2, आर्मी पब्लिक स्कूल दानापुर और उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसन्धान संस्थान से कुल 70 छात्रों ने मधुबनी पेंटिंग, मृण्मूर्ति कला, पटना कलम, मञ्जूषा कला और टिकुली कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया। युवा कलाकार एवं प्रशिक्षकों ने छात्रों को उनके पसंद की कलाओं का प्रशिक्षण दिया। सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद बिहार संग्रहालय के महानिदेशक एवं मुख्यमंत्री के सलाहकार अंजनीकुमार सिंह ने अपने उद्घाटन भाषण में आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि बिहार की पारंपरिक कला को सीखने और समझने के लिए इतनी संख्या में छात्रों के उत्साहपूर्ण भागीदारी से मैं अभिभूत हूँ। यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया चाहे जितनी बदल गई हो, बिहार के युवाओं की कला-प्रियता कम नहीं हुई है। हमारे युवाओं के हाथों में हमारी कलात्मक विरासत सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि बिहार की पारंपरिक कलाएं केवल शौकिया ही नहीं बल्कि रोजगार का भी बहुत बड़ा साधन है। हमने सरकार की ओर से एक प्रशिक्षण संस्थान भी खोला है, जिसमें प्रशिक्षण देने के लिए प्रोफेसर की नियुक्त डिग्री के आधार पर नहीं बल्कि काम के आधार पर किया गया है।

विशिष्ट अतिथि के तौर पर बिहार के मूर्धन्य कलाकार और रेलवे स्टेशनों को मधुबनी कला से सजाने वाले भारत के प्रथम कलाकार राजेन्द्र प्रसाद मंजुल ने कहा कि बिहार की धरती परंपरागत कलाओं की विविध रंगों से सजी एक बड़े कैनवास की तरह है, जिसे समय का धूल कभी धूमिल नहीं कर सकता। युवा पीढ़ी में इन कलाओं के प्रति अनुराग पैदा करने के इस पावन कार्य की मैं भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूँ।

विश्व विरासत दिवस

कार्यशाला को संबोधित करते हुए बिहार पुराविद परिषद् के महासचिव डॉ. उमेश चन्द्र द्विवेदी ने कहा कि कि बिहार की भूमि कला-प्रसूता है। मानव सभ्यता के विकास की उषा काल में ही यहाँ कलाओं का उदय हुआ, जिसके पुरातात्विक प्रमाण शैल और गुफा चित्रों के रूप में आज भी हमारे सामने हैं। बिहार की कलाएं मानव जीवन की गहराइयों से उद्भूत हैं, अतः शाश्वत हैं। इन कलाओं के प्रति हमारा प्रेम ही इनके संरक्षण और विकास की गारंटी है। अतः आवश्यक है कि हम इन्हें अपनी नयी पीढ़ी को सौंपने का अथक प्रयास करें।

इस अवसर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पटना मंडल के सहायक अधीक्षक पुरातत्वविद डॉ. प्रसन्ना दीक्षित, फेसेस की महासचिव सुनिता भारती, फेसेस के संस्कृति सचिव शुभम सिंह, बिहार संग्रहालय के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. सुनील कुमार झा सहित अन्य गणमान्य लोग भी उपस्थित थे।

उधर इस अवसर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,पटना सर्किल द्वारा नालंदा महाविहार पुरातात्विक स्थल (प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय) में भी छात्रों के बीच चित्रकला व भाषण प्रतियोगिता, विश्व धरोहर स्थलों की फोटो प्रदर्शनी और वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

प्रति वर्ष 18 अप्रैल को विश्व विरासत दिवस मनाया जाता है । संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनेस्को द्वारा घोषित इस दिवस को मनाये जाने का उद्देश्य अपनी विरासत के प्रति जन जागरूकता पैदा करना है । इस समय 1150 के करीब विश्व विरासत स्थल हैं इनमें से 40 भारत में स्थित हैं । विश्व विरासत स्थल वे स्थल या विरासत हैं, जिनके बारे में यह स्वीकार किया जाता है कि इनका निर्माण किसी देश, जाति या पंथ का न होकर संपूर्ण मानव जाति की उपलब्धि है और इस प्रकार उनका सार्वभौमिक मूल्य है और इसलिए उनके अस्तित्व को संरक्षित एवं सुरक्षित रखना संपूर्ण मानव जाति का कर्तव्य है ।

2,500 साल पुरानी सायक्लोपियन वाॅल को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल करने की कवायद

पटना । सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को राजगीर में 2,500 साल से अधिक पुरानी साइक्लोपियन दीवार को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में सूचीबद्ध करने के लिए एक नया प्रस्ताव भेजा है। नीतीश सरकार ने भेजा प्रस्ताव।

राजगीर की साइक्लोपियन दीवार पत्थर की 40 किमी लंबी दीवार है, जिसे तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहले बनाया गया था। बाहरी दुश्मनों और आक्रमणकारियों से बचाने के लिए इस दीवार को बनाया गया था।

बिहार के दांडी गढ़पूरा के ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह की 92 वर्षगांठ

बिहार के दांडी’ गढ़पूरा के ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह की 92 वर्षगांठ पर इस वर्ष भी मुंगेर से वाया श्रीकृष्ण सेतु- बलिया-बेगूसराय- मंझौल होते हुए ऐतिहासिक व गौरवशाली नमक सत्याग्रह स्थल तक एक भव्य पदयात्रा आयोजित की जायेगी। वर्ष 2012 से प्रतिवर्ष आयोजित इस पदयात्रा के 12वें वर्ष पर आज पंचवीर में एक तैयारी बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता पंचवीर पंचायत की पूर्व सरपंच व कांग्रेस नेत्री रेणु देवी ने किया। कार्यक्रम का संचालन गढ़पुरा नमक सत्याग्रह गौरव यात्रा समिति के सक्रिय सदस्य व भगत सिंह यूथ फाउंडेशन के पदाधिकारी राम प्रवेश चौरसिया ने किया।

अपने संबोधन में रेणु देवी ने कहा की बापू ने एक चुटकी भर नमक से कभी नहीं अस्त होने वाली ब्रिटिश सत्ता को सदा के लिए सूर्यास्त का रास्ता दिखा दिया था. देश के प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर “आजादी का अमृत उत्सव” पर्व मनाने की शुरुआत की, यह प्रशंसनीय है. आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष के अवसर पर आयोजित इस वर्ष की पदयात्रा ऐतिहासिक होगी। उन्होने कहा की गढपुरा का ऐतिहासिक व गौरवशाली नमक सत्याग्रह स्थल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक अनमोल विरासत है और “बिहार केसरी” श्रीबाबू की कर्मभूमि है। वर्तमान व आनेवाली पीढियों के हित में ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह व स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानियों की स्मृतियों को संजोने व संवारने की सख्त जरूरत है। उन्होंने साहबपूर कमाल विधानसभा क्षेत्र के लोगों के साथ-साथ बेगूसराय जिला व राज्य के लोगों से इस पदयात्रा में शामिल होने का आग्रह किया।

समाजसेवी राम आशीष पाठक ने कहा कि इस बार की पदयात्रा में लोग बढ़-चढकर भागीदारी सुनिश्चित करेंगे। श्री पाठक ने बताया कि इस वर्ष की पदयात्रा कोविड नियमों के अनुपालन करते हुये भव्यता के साथ आयोजित की जायेगी।

संचालक कर रहे राम प्रवेश चौरसिया ने कहा कि समाज के सभी वर्ग के लोगों को अपने नौनिहालों व आनेवाली पीढियों के हित में अपनी विरासतों का संरक्षण व संवर्द्धन करना चाहिए। नमक सत्याग्रह गौरव यात्रा का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम की अनमोल विरासत को वर्तमान व आनेवाली पीढियों के हित में सुरक्षित, संरक्षित व संवर्द्धित करना है,जिससे की वह एक बेहतर नागरिक बनकर राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकें. उन्होंने बताया की नमक सत्याग्रह गौरव यात्रा रुट पर जनसंपर्क और बैठक आयोजित कर समाज के सभी वर्ग के लोगों के बीच जनजागरण अभियान चलाया जा रहा है। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इस ऐतिहासिक व गौरवशाली कार्यक्रम का हिस्सा बन सकें।

अपने संबोधन में ग्रामीण व प्रखंड कांग्रेस अध्यक्ष संजीव झा ने कहा की वह खुद तो निश्चित तौर पर पदयात्रा में शामिल होंगे ही, साथ ही साथ जिलेवासियों से भी यह आग्रह करते हैं की वह इस ऐतिहासिक व गौरवशाली पदयात्रा में अवश्य शामिल हों।

जेडीयू प्रखंड अध्यक्ष शंभू कर्मशील ने साहेबपुर कमाल वासियों से पदयात्रा को सफल बनाने में सहयोग का निवेदन किया । तथा जिलेवासियों को देश की इस ऐतिहासिक, गौरवशाली,अनूठी व अपने-आप में ईकलौती पदयात्रा में शामिल होने का आग्रह किया।

इस बैठक में विद्यानंद सिंह शिक्षक नेता, अनिल पाठक, विनोबा पाठक, सुधाकर सिंह, रंजीत झा, निपुण झा, अमन झा, धर्मेंद्र पाठक, हीरा सिंह, सुनील जसवाल, भूषण पाठक भूषण पाठक, नारायण झा, सुबोध पाठक इत्यादि उपस्थित थे ।

उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करके हुआ आस्था के महापर्व चैती’छठ’ का समापन

छठ अकेली ऐसी पूजा है, जिसमें उगते हुए और अस्त होते हुए सूर्य की पूजा की जाती है। अस्त होता सूरज जहां आपको कालचक्र के बारे में बताता है तो वहीं उगता सूरज नई सोच और ऊर्जा का प्रतीक है और जीवन में आगे बढ़ने के लिए इन दोनों चीजों का होना बहुत ज्यादा जरूरी है। आपको बता दें कि आम से लेकर खास तक सभी ने पूरी श्रद्धा के साथ छठ पूजा की और अपने परिवार की खुशहाली के लिए सूर्य भगवान और छठ मैया से प्रार्थना की।

बगहा
आस्था के महापर्व चैती’छठ’ आज सुबह बगहा औऱ रामनगर छठ वर्ती महिलाओं ने उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया। श्रद्धालुओं ने सुबह-सुबह ही घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया। जिसके बाद उपवास रखने वाले व्रतियों ने छठ मैया का प्रसाद ग्रहण कर व्रत तोड़ा। आपको बता दें छठ पूजा करने का उद्देश्य जीवन में सूर्यदेव की कृपा और छठ मैया का प्रेम-आशीष पाना है। सूर्य की कृपा से आयु और आरोग्य की प्राप्ति होती है तो वहीं छठ मैया के आशीष से इंसान को सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

बेगूसराय
बेगूसराय में उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ ही चार दिवसीय चैती छठ पर्व समाप्त हो गया। इस मौके पर बेगूसराय जिले के भी झमटिया गंगा घाटों पर छठ व्रतियों ने सूप के साथ  भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर पूजा का समापन किया।  चैती छठ व्रत को लेकर लोगों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है एवं छठ व्रतियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में लोग गंगा घाटों पर मौजूद हैं। जिले के कई पोखरों के साथ-साथ घरों पर भी लोगों ने लोक आस्था का पर्व चैती छठ को पूरे धूमधाम से मनाया। 4 दिनों तक चलने वाले इस छठ पर्व के अंतिम दिन उगते सूर्य की उपासना कर छठ पर्व का समापन हो गया। छठ व्रतियों ने घर परिवार समाज और देश की समृद्धि की कामना की है।

गया जिला के विभिन्न घाटों पर चैती छठ पूजा सम्पन हो गया, उगते हुए सूर्य का पूजा जल, दूध, धूप फल समर्पित कर किया गया।

आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है

आज ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ है। आधुनिकता और तेज वैश्वीकरण की भागदौड़ में लगातार पिछड़ती और विस्मृत होती जा रही अपनी मातृभाषा को याद करने और उसकी पहचान, उसकी अस्मिता को बनाए रखने का संकल्प लेने का दिन।

मेरी अपनी मातृभाषा भोजपुरी है। दुर्भाग्य से दुनिया की एक बड़ी आबादी द्वारा बोली जानेवाली यह बेहद समृद्ध भाषा आज अश्लीलता की गंभीर चुनौतियों से दो-चार है। बाज़ार के दबाव में फूहड़, बेहूदा, मातृद्रोही सिनेमा से जुड़े लोगों और असंख्य गायक-गायिकाओं ने इसे अश्लीलता का पर्याय बनाने का जैसे अभियान चला रखा हैं।

हालत यह है कि कोई भी सुसंस्कृत व्यक्ति इस भाषा का सिनेमा देखने या गीत सुनने में अब शर्म महसूस करने लगा है। हां, इस निराशाजनक समय में उम्मीद जगाते हैं कुछ ऐसे कलाकार और गायक-गायिकाएं जो अपनी भाषा के सम्मान के लिए सतत संघर्ष कर रहे हैं।

#भोजपुरी
#भोजपुरी

इस आशा के साथ कि भोजपुरी अपसंस्कृति के चंगुल से निकलकर एक बार फिर अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त करेगी, सभी भोजपुरी भाषियों को मातृभाषा दिवस की मेरी शुभकामनाएं,मेरी अपनी एक भोजपुरी कविता ‘आस’ के साथ !

केहू ना कहेला बाकि
बिहान होते चिरई हांक लगा जालि
ओस नहाली दूब
उछाह से बहेली नदी
अगरा जाला गाछ-बिरिछ
सुरूज के पहिलका किरिन के संगे
केहू ना देखेला बाकि
चुपे अंखुआ जालि फसल
कोंपल फेंक डेला पौधा
पतईंन में उतर जाला हरियरी
फल में रस
फूल में गंध
अंखियन में नेह
केहू ना जानेला बाकि
बाबू जी के मन में बारी-बारी से
काहे धुंधुआत चल जाला
एक-एक गो नेह-नाता
साच्छात उतरे लागेले जमराज
माई के भोरे के सपना में
कइसनो मौसम में
बचा के राख लेलि भौजी
भिंडी आ करइला के बिया
मेहरारू गुल्लक में पईसा
बचवा सब आंखि में नींद
केहू ना बचावेला बाकि
घोर से घोर दुरदिन में भी
बाचल रहेला जरूर कौनो आस
तबे त हमनी
सहेज के राखेनी ओकर पाती
जेकरा से मिले के
कौनो आस ना बाचल रहेला।


लेखक — ध्रुव गुप्त(पूर्व आईपीएस अधिकारी)

बिहार में एक ऐसा गांव है जहां लड़किया जनेऊ पहनती है

बिहार में एक गांव ऐसा भी है जहां लड़किया जनेऊ पहनती है । यह सूनने में थोड़ा अटपटा लगा रहा होगा लेकिन यह सच्चाई है । बक्सर जिले के डुमरांव अनुमंडल के नावानगर प्रखंड में एक गांव है मणियां जहां प्रति वर्ष बसंत पंचमी के दिन लड़कियों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता है।

यह अनोखी परंपरा मणियां गांव स्थित दयानंद आर्य हाईस्कूल में प्रति वर्ष आयोजित होती है। इस स्कूल में पढ़ने वाली छात्राएं स्वेच्छा से जनेऊ धारण करती हैं। यहां जनेऊ धारण करने वाली छात्राएं रुढ़िवादी परंपरा को खत्म करने के साथ चरित्र निर्माण की शपथ लेती हैं। अभिभावकों का कहना कि इससे नारी शक्ति को बढ़ावा मिल रहा है।

परिवार व समाज का मिल रहा सहयोग
यज्ञोपवीत पहनने की मुहिम में लड़कियों को परिवार व समाज से भी भरपूर सहयोग मिल रहा है। पिछले साल आचार्य श्रीहरिनारायण आर्य और सिद्धेश्वर शर्मा के नेतृत्व में शिल्पी कुमारी, बसंती कुमारी, अनु कुमारी, नीतु कुमारी, खुशबू कुमारी एवं नीतु कुमारी सहित अन्य कई छात्राओं का उपनयन संस्कार किया गया था। इस बार भी बसंत पंचमी के दिन लड़कियों को जनेऊ पहनाने की तैयारी चल रही है। इस आयोजन को लेकर गांव में उत्‍सवी माहौल बना हुआ है।

विद्यालय के संस्थापक ने चलाई थी यह परंपरा
मणियां उच्च विद्यालय के संस्थापक और इसी क्षेत्र के छपरा गांव निवासी स्व. विश्वनाथ सिंह ने 1972 ई. में इस परंपरा की शुरुआत की थी। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी पुत्रियों को जनेऊ धारण कराया था। उसके बाद फिर यह परंपरा चल पड़ी। तब से हर वर्ष यहां लड़‍कियों का यज्ञोपवीत संस्‍कार किया जाता है। स्व. सिंह आर्यसमाजी थे। मणियां के ग्रामीणों का कहना है कि गुरुजी का इसके पीछे मुख्य उद्देश्य था कि नारी शक्ति को श्रेष्ठ कराने से समाज का कल्याण हो सकता है।

मूर्तिपूजा का नहीं है प्रचलन
आचार्य सिद्धेश्वर शर्मा का कहना है, बसंत पंचमी के दिन विद्यालय की छात्र-छात्राएं हवनकुंड के समक्ष बैठकर आचार्य से श्रेष्ठ आचरण, आदर्श जीवन व सद्चरित्र का संस्कार ग्रहण करती हैं।

अब दिल्ली में गया के तिलकुट और भागलपुरी कतरनी चूरा का लुत्फ़ उठा सकेंगे बिहारवासी, मकर संक्रांति के मौक़े पर बिहारिका की ख़ास पहल

अब दिल्ली में गया के तिलकुट और भागलपुरी कतरनी चूरा का लुत्फ़ उठा सकेंगे बिहारवासी, मकर संक्रांति के मौक़े पर बिहारिका की ख़ास पहल

• बिहारिका में तिलकुट, चूरा, गुड़, लाई, मखाना उपलब्ध

• बिहार के अलग-अलग ज़िलों से मंगवाए गए पकवान

• बिहार की संस्कृति को सहज तरीक़े से प्रसारित करने का ‘बिहारिका’ एक सुलभ माध्यम बनकर उभरा है।

• “बिहारिका न सिर्फ़ दिल्ली में स्थित बिहार के निवासियों के लिए बिहार से जुड़ने का एक मौक़ा है बल्कि वहाँ के कारीगरों, बुनकरों और किसानों को आर्थिक रूप से सहयोग करने का एक रास्ता भी है,” स्थानिक आयुक्त, बिहार भवन

नई दिल्ली के बिहार निवास, चाणक्यपुरी स्थित ‘बिहारिका’ में आगामी मकर संक्रांति को लेकर तैयारियाँ शुरू हो गईं है। बिहार की कला देहरी, बिहारिका, में बिहार के अलग-अलग ज़िलों के हस्तशिल्प और हथकरघा निर्मित उत्पादों के अलावा खाने-पीने की चीज़ों को भी शामिल किया गया है। इनमें गया का तिलकुट, भागलपुरी कतरनी चूरा, गुड़, मटकी दही, धनरुआ की लाई, मिथिला मखाना और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल हैं। 11 जनवरी मंगलवार से 14 जनवरी तक ये सामान उपलब्ध होंगे।

स्थानिक आयुक्त, पलका साहनी (भाप्रसे) ने बताया, “राजधानी दिल्ली में रहने वाले बिहार के वे लोग जो खास तौर पर वहाँ त्योहारों पर बिहार के पकवान को मिस करते हैं, उनके लिए हमने इस पहल की शुरुआत की है। बाजार में उपलब्ध कतरनी चूरा की गुणवत्ता उत्तम मानी जाती है। यह बेहद नरम और सुगंधित होता है। चावल की इस किस्म की न केवल भागलपुर जिले में बल्कि पूरे देश में भारी मांग है। ऐसा माना जाता है कि कतरनी चावल की सुगंध और स्वाद, इस जिले में प्राकृतिक रूप से बनने वाले पर्यावरण का एक उपहार है। बिहारिका में गया का तिलकुट भी उपलब्ध है। हमने अक्सर ये महसूस किया है कि बिहार के पकवानों की दिल्ली में बहुत मांग है। देश-विदेशों तक तिलकुट, लाई और खाजा को पसंद किया जाता है। हमें विश्वास है कि आने वाले समय में राजधानी दिल्ली और बिहार की दूरी बिहार राज्य के व्यंजन और कला से पाट दी जाएगी।”

ज्ञात हो कि बिहार से 300 किलो उच्च क्वालिटी का कतरनी चूड़ा, 100 किलो चावल, 50 किलो गुड़ और गया का खास्ता तिलकुट बिहार भवन भेजा गया है।

पवित्र पिंड दान और गौतम बुद्ध के अलावा, तिलकुट गया जी की संस्कृति है

माना जाता गया के रमना मोहल्ले में तिलकुट की शुरू हुआ। टेकरी रोड, कोइरीबाड़ी, स्टेशन रोड समेत कई इलाकों में तिलकुट के कारीगर रहते हैं। रमना रोड और टेकरी के कारीगरों द्वारा बनाया गया तिलकुट आज भी बहुत स्वादिष्ट होता है। वे बताते हैं कि कुछ ऐसे परिवार भी गया में हैं, जिनका पारिवारिक पेशा यह हो गया है। खस्ता तिलकुट के लिए मशहूर गया का तिलकुट झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र समेत अन्य राज्यों में भेजा जाता है।

भगवान बुद्ध और ‘तिल’ का संबंध

ऐसा माना जाता है कि बुद्ध तिल (तिल) खाने पर जीवित रहे जब उन्होंने बोधगया में वर्तमान महाबोधि मंदिर के पास उरुवेला में कठोर तपस्या का अभ्यास करना शुरू किया। पाली सूत्रों का उल्लेख है कि उन्होंने कम से कम भोजन और पानी लेना शुरू कर दिया, ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने शायद ही कभी खाया। वह केवल उबलते चावल (अकामा) (मांड), या तिल के बीज (पिनाका) से तेल निकाले जाने के बाद बचे हुए ठोस पदार्थों से बचे हुए पर जीवित रहना शुरू कर दिया। वह आगे प्रतिदिन केवल चावल या तिल के एक दाने पर जीवित रहने लगे। वह कमजोर और पतला हो गया और इस अवस्था के बाद ही उसने मध्य मार्ग का अनुसरण करने का फैसला किया और अंत में आत्मज्ञान प्राप्त किया।

श्रीमती साहनी ने आगे बताया, “बिहार में मकर संक्रांति को सकरात या खिचड़ी भी बोला जाता है। देश के किसानों के प्रति आभार प्रकट करते हुए ताजे खेती वाले चावल का उपयोग ‘खिचड़ी’ बनाने के लिए किया जाता है जिसे सकरात की शाम घी, पापड़, दही और अचार के साथ परोसा जाता है। बिहारिका में नये चावल की खेप भी आई है जिसे आम लोग 14 तारीख़ से पहले आसानी से ख़रीद सकते हैं। इसके अलावा मटकी वाली ताजे दूध की दही, गुड़ और बिहार के धनरुआ में निर्मित खोये और रामदाने की लाई भी उपलब्ध है। बिहारिका न सिर्फ़ दिल्ली में स्थित बिहार के निवासियों के लिए बिहार से जुड़ने का एक मौक़ा है बल्कि वहाँ के कारीगरों, बुनकरों और किसानों को दूर रहते हुए भी आर्थिक रूप से सहयोग करने का एक रास्ता भी है। बिहार की संस्कृति को सहज तरीक़े से प्रसारित करने का बिहारिका एक सुलभ माध्यम बनकर उभरा है।“

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गुरु पर्व के मौके पर 1 जनवरी 2022 से पटना साहिब स्टेशन पर 23 ट्रेनों का होगा ठहराव

गुरु पर्व को देखते हुए इस बार भी 1 जनवरी 2022 से पटना साहिब रेलवे स्‍टेशन पर 23 जोड़ी ट्रेनों का ठहराव देने की घोषणा की है । इन ट्रेनों ठहराव अस्‍थाई तौर पर देने की बात कही गई है. ये ट्रेनें पटना साहिब रेलवे स्‍टेशन पर 2 मिनट तक रुकेंगी ।

पूर्व-मध्‍य रेलवे के अंतर्गत आने वाल पटना साहिब रेलवे स्‍टेशन पर तकरीबन दो दर्जन जोड़ी ट्रेनों का ठहराव 1 जनवरी से 15 जनवरी 2022 तक के लिए होगा. इससे आम यात्रियों के साथ ही देश के विभिन्‍न हिस्‍सों से आने वाले सिख श्रद्धालुओं को भी सुविधा होगी. भारतीय रेल की तरफ से इन सभी ट्रेनों की सूची भी जारी कर दी गई है ।

दरअसल, सिखों के 10वें गुरु श्री गोबिंद सिंह जी की 355वीं जयंती है, जिसे सिख समुदाय प्रकाश पर्व के तौर पर मनाते हैं. गुरु गोबिंद‍ सिंह जी का जन्‍म पटना साहिब में ही हुआ था. उनकी याद में यहां तख्‍त श्री हरमंदिर साहिब का प्रसिद्ध गुरुद्वारा स्थित है. हर साल प्रकाश पर्व के मौके पर यहां बड़ी तादाद में सिख श्रद्धालु जुटते हैं. प्रकाश पर्व को देखते हुए भारतीय रेल ने भी तैयारी की है. उसी के तहत पटना साहिब रेलवे स्‍टेशन पर 23 जोड़ी ट्रेनों का ठहराव दिया गया है, ताकि दूर-दराज से ट्रेनों से आने वाले श्रद्धालु आसानी से गुरुद्वारा पहुंच सकें हलांकि बिहार सरकार पटना साहिब स्टेशन पर अधिक से अधिक गांड़ियों का ठहराव हो सके इसके लिए रेल मंत्रालय से लगातार मांग करता रहा है ।

Asansol-Chhatrapati Shivaji Terminal Mumbai (12361/12362)
Raxaul-Lokmanya Tilak Karmabhoomi (12545/12546)
Rajgir-Varanasi Budh Purnima (14223/14224)
Dibrugarh-Delhi Mahananda (15483/15484)
Howrah-Prayagraj Vibhuti (12333/12334)
Shalimar-Patna Duronto (22213/22214)
Puri-Patna (18449/18450)
Okha-Guwahati (15635/15636)
Bhagalpur-Surat (22947/22948)
Banka-Rajendra Nagar (13241/13242)
Kolkata-Nangal Dam (12325/12326)
Howrah-New Delhi Poorva (12303/12304)
Dhanbad-Patna Intercity (13331/13332)
Bhagalpur-Ajmer (13423/13424)
Kolkata-Jhansi (22197/22198)
Malda Town-New Delhi (14003/14004)
Patna-Jaynagar (15527/15528)
Bhagalpur-Anand Vihar Garib Rath (22405/22406)
Darbhanga-Mysore (12577/12578)
Howrah-Dehradun Upasana (12327/12328)
Howrah-Haridwar Kumbh (12369/12370)
Kolkata-Udaipur Ananya (12315/12316)
Jaynagar-Anand Vihar Express (12435/12436)

ऐतिसाहिक धरोहर को लेकर सरकार गंभीर नहीं

पटना हाईकोर्ट ने विनय कुमार सिंह की जनहित याचिका को सुनते हुए केंद्र सरकार व राज्य सरकार को लोमस और यज्ञबल्कय ऋषि के गुफाओं व पहाड़ियों का फोटो दो सप्ताह में कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया है। इस जनहित याचिका पर जस्टिस राजन गुप्ता की खंडपीठ ने सुनवाई की।

हाईकोर्ट में केंद्र सरकार ने माना कि इन पहाड़ियों का धार्मिक महत्त्व है और वहां पूजा अर्चना होती हैं।लेकिन ये पुरातत्व महत्व का स्थल नहीं है।

याचिका में ये कहा गया कि लोमस और याज्ञवल्कय ऋषि की गुफाएं केवल ऐतिहासिक दृष्टि से ही नही, बल्कि जैव विविधता के दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है । ऐसे स्थानों को संरक्षित करने की बजाए समाप्त किया जा रहा है।इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने संवेदनशीलता नहीं दिखाई हैं।

राज्य सरकार के खनन व पर्यावरण विभाग के अधिवक्ता नरेश दीक्षित ने कोर्ट को बताया कि ये गुफाएं व पहाड़ी पर्यटन स्थल या ऐतिहासिक महत्व की नहीं हैं।लेकिन राज्य सरकार इसे संरक्षित रखेंगी और इसे नष्ट नहीं होने देगी।

इन पहाड़ के जंगल व आस पास होने वाले खनन कार्य पर पटना हाईकोर्ट ने 20 जुलाई, 2021 को रोक लगा दी थी। यह रोक को अगली सुनवाई तक जारी रखने का कोर्ट ने निर्देश दिया था।

सुनवाई के दौरान कुछ लोगों ने हस्तक्षेप अर्जी के जरिये खनन कार्य पर से रोक हटाने का अनुरोध किया, जिसे हाई कोर्ट ने नामंजूर कर दिया ।

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि 1906 में प्रकाशित तत्कालीन गया जिले के गज़ट में दोनों पहाड़ियों का सिर्फ पुरातात्विक महत्त्व ही नही बताया गया हैं, बल्कि वहां की जैव विविधता के बारे में भी अंग्रजों ने लिखा है।

उन पहाड़ियों के 500 मीटर के दायरे में झरना , बरसाती नदी और एक फैला हुआ वन क्षेत्र है। उस जंगल को अवैध खनन कर बर्बाद किया जा रहा है।

लोमस और याज्ञवल्कय पहाड़ियों को आर्कियोलॉजिकल एवं हेरिटेज साइट बनाने का कोर्ट से आग्रह किया गया। कोर्ट ने दोनों पहाड़ियों के वन क्षेत्र विस्तार और रिहाइशी बस्तियों के बिंदु पर राज्य व केंद्र सरकार से जवाब मांगा था । इस मामले पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद की जाएगी।

सात समंदर पार बिखेर रहे छठ पूजा की अद्भुत छटा

महापर्व छठ बिहार की दहलीज से निकलकर विदेश में भी अद्भुत छटा बिखेर रहे हैं। अमेरिका के बोस्टन और बर्जीनिया में छठ पर्व को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है।

अमेरिका के बोस्टन शहर छठ की गीत से गूंजा

विदेश में बसे बिहारियों का कहना है कि वे बाहर रहने गये हैं। लेकिन अपनी परंपरा और सूर्योपासना के पर्व छठ को कैसे भूल सकते हैं। सूर्य की महिमा पूरी दुनिया जान सके, यही उनका मकसद है।

अमेरिका के बर्जीनिया शहर छठ की गीत से गूंजा

आजादी के बाद देश में फैले हिंसा के दौरान 84 दिन गाँधी पटना में रहे थे ।

महात्मा गाँधी और मेरे परदादा मंज़ूर सुब्हानी की साथ की तस्वीर। 20 मार्च से 30 मार्च 1947 तक महात्मा गांधी बिहार में ही रहकर दंगे की आग में झुलस रहे लोगो से शांति का प्रयास कर रहे थे।इस दौरान वे मसौढ़ी, पटना, हांसदीह, घोड़ौआ, पिपलवां, राजघाट, जहानाबाद, घोसी, अमठुआ, ओकरी, अल्लागंज, बेला, जुल्फीपुर, अबदल्लापुर, बेलार्इ, शाइस्ताबाद आदि स्थानों पर मुस्लिम लीग के सदस्यों, हिन्दू महासभा के सदस्यों, स्त्री-पुरुष मुसलमान शरणार्थियों से मिले एंव ग्राम प्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से बातचीत की।

गाँधी बिहार में

प्रतिदिन सामूहिक प्रार्थना-प्रवचन किये।
राष्ट्रपिता महात्मा हमारे पूर्वजों के गाँव ज़ुल्फीपुर (मोदनगंज)भी पहुँचे थे ।वहाँ साम्प्रदायिक दंगे में हुई छति का जायज़ा लेने पहुँचे गाँधी जी ने हमारे परदादा मंज़ूर सुब्हानी जो कि स्थानीय जमींदार थे से विस्तृत जानकारी ली ।

दंगे में उस वक़्त हमारे पूर्वजो को भी वह जगह छोड़नी पड़ी थी परिवार के औरतें खुद को उस इंसानियत खो चुकी भीड़ से बचने के लिए घर के पास बने कुआँ में बच्चों संग छलांग लगा दी थी ।

ये तस्वीरे उसी कुँए की है जिसे देखने अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देखने पहुँचे थे। दंगे के बाद तब हमारे परदादा वहाँ गांधी जी के साथ खड़े थे वही कुआँ को दर्शाते हुए पूरी कहानी उन्हें बता रहे थे। गांधी जी इतनी भी हिम्मत नही हो पा रही थी वो कुआँ अंदर झांके बहुत भयावह हाल था।

परिवार के जो लोग वहाँ से भाग निकले थे वह काको आ कर बसे और यहाँ मकान बना ।
तसवीरें हमारे उसी पैतृक घर की है जो घर दंगे के कारण वीरान हो चुका था गांधी जी उसी घर का मुआयना करते नज़र आ रहे हैं। इससे ज़्यादा कहानी न मैं लिख पाऊंगा न आप पढ़ पाएंगे ।

गाँधी चंपारण में

बिहार के इसी कौमी दंगों में अथक दौरा करते गांधीजी ने मार्च 1947 में बिहार के सर्वमान्य नेताओं से सार्वजनिक रूप से पूछाः ” आपसे पूछना चाहता हूं कि आपकी आंखों के सामने 110 साल की उम्र वाली महिला का कत्ल हुआ और आप उसे देख कर भी जिंदा हैं तो कैसे ? …न मैं शांत बैठूंगा, न आपको बैठने दूंगा।… मैं पांव पैदल सारी जगहों पर भटकूंगा और हर कंकाल से पूछूंगा कि उसके साथ क्या हुआ… मेरे भीतर ऐसी आग धधक रही है जो मुझे तब तक शांति से बैठने नहीं देगी जब तक मैं इस पागलपन का कोई इलाज न खोज लूं। और अगर मुझे यह पता चला कि मेरे साथी मुझे धोखा दे रहे हैं तो मैं उबल ही पडूंगा और आंधी-तूफान कुछ भी हो, मैं नंगे पांव चलता ही जाऊंगा…”

बस इससे ज़्यादा अब मैं नहीं लिख पाऊंगा पर वो वक़्त तो गुज़र गया पर आज भी उन घटनाओं को किताबो में पढ़ता हूँ तो आंसू आज भी नही रुकते।

तीनकठिया आन्दोलन से जुड़े लोकगीत

तीनकठिया स दियेलहुं मुक्ति आबि अहां यउ गाँधी जी

कहिया धरि हम गहुंम उगेबै आब अहां आउ गाँधी जी

आरि कटैये, धुरि कटैये, कटैये पूरजी गांधी जी
हडपि खेत सरकार कहैये, चलयनै मरजी गांधी जी
कोना हम अपन खेत लुटेबै, आब अहां आउ गांधी जी
तीनकठिया स दियेलहुं मुक्ति आबि अहां यउ गांधी जी

कहिया धरि हम गहुंम उगेबै आब अहां आउ गाँधी जी

माछ ये उपटल, पान ये उपटल, उपटल मखान ये गाँधी
पोखरिक ठेकेदार कहैये, चुका लगान ये गाँधी जी
कथी स अपन खेत पटेबै, आब अहां आउ गाँधी जी
तीनकठिया स दियेलहुं मुक्ति आबि अहां यउ गाँधी जी

कहिया धरि हम गहुंम उगेबै आब अहां आउ गाँधी जी

कार्ड ये भेटल, वार्ड ये भेटल, भेटल आधार ये गाँधी जी
देशक सब अखबार कहैये, छै रोजगार ये गाँधी छी
कतए हम अपन पेट नुकेबै, आब अहां आउ गाँधी जी
तीनकठिया स दियेलहुं मुक्ति आबि अहां यउ गाँधी जी
कहिया धरि हम गहुंम उगेबै आब अहां आउ गाँधी जी

कवि : भवेशनाथ

भारतीय सिनेमा का पहला गीत !

भारतीय सिनेमा का पहला गीत !

भारत की सबसे पहली बोलती फिल्म थी ‘आलम आरा’। वर्ष 1931 की इस फिल्म के निर्देशक थे अर्देशिर ईरानी। उन्होंने भारतीयों के बीच संगीत की लोकप्रियता को समझा और इस फिल्म में सात गाने डाले। उनमें से पहला गाना था ‘दे दे खुदा के नाम पे प्यारे’। यह एक प्रार्थना गीत था जिसके गायक थे अभिनेता वजीर मोहम्मद खान। वज़ीर खान ने फिल्म में एक फकीर का चरित्र निभाया था। ‘आलम आरा’ सिर्फ एक सवाक फिल्म नहीं थी बल्कि यह बोलने-गाने वाली फिल्म थी जिसमें बोलना कम और गाना ज्यादा था। इस फिल्म के संगीतकार थे फिरोजशाह मिस्त्री और बी ईरानी। इसी फिल्म के साथ हमारे यहां फिल्मी संगीत की नींव पड़ी। फिल्म के साथ इसके संगीत को भी व्यापक सफलता हासिल हुई। ‘दे दे खुदा के नाम पर प्यारे’ को भारतीय फिल्म के पहले गीत और वज़ीर खान को पहला गायक होने का गौरव प्राप्त हुआ। उस दौर में फिल्मों में पार्श्व गायन की परंपरा शुरु नहीं हुई थी। गीत को हारमोनियम और तबले के साथ सजीव रिकॉर्ड किया गया था।

दुर्भाग्य से भारत की पहली बोलती फिल्म का कोईभी प्रिंट अब उपलब्ध नहीं है। गीत की उपलब्ध रिकॉर्डिंग बेहद अस्पष्ट है । फिल्म शोधकर्ताओं ने इस ऐतिहासिक गीत को श्रीमती कृष्णा अटाडकर की आवाज़ में रिकॉर्ड कर भारतीय सिनेमा के पहले गीत के जादू को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।

-लेखक ध्रुव गुप्ता (पूर्व आईपीएस अधिकारी )

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हनुमान मंदिर की सुरक्षा को लेकर हाईकोर्ट सख्त सरकार से मांगी विस्तृत रिपोर्ट

पटना हाई कोर्ट ने राजधानी के पटना सिटी स्थित जल्ला हनुमान मंदिर की सुरक्षा व संरक्षण तथा वहाँ जलाशय पर किये गए अतिक्रमण के मामले पर सुनवाई की।चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने गौरव कुमार सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए नगर निगम आयुक्त को सफाई और रौशनी की व्यवस्था के मामले पर हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि चूँकि राजस्व सचिव ने कमेटी का गठन कर दिया है, इसलिए राजस्व सचिव इस मामले पर हलफनामा दायर करें।

इस मामले में कोर्ट ने विगत 5 जुलाई को राजस्व सचिव को एक कमेटी का गठन करने का आदेश दिया था। पटना के जिला विकास आयुक्त की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर दिया गया है।

कोर्ट ने जलाशय की सुरक्षा के लिये उपाय करने को भी कहा था। पटना के जिलाधिकारी को संबंधित क्षेत्र को वीडियोग्राफी करवाकर के की गई कार्रवाई के संबंध में रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया था।

पिछले 27 जुलाई को कोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड में सुधार करने को भी कहा था। उसके बाद अपर जिलाधिकारी ने राजस्व रिकॉर्ड में सुधार करते हुए आवश्यक आदेश पारित किया।

पिछले 23 अगस्त को कोर्ट ने पटना के जिलाधिकारी को राजधानी के बीचों बीच स्थित इस जलाशय की सुरक्षा हेतु कार्रवाई करने को कहा था। कोर्ट ने जलाशय की घेराबन्दी करने को भी कहा ,ताकि जलाशय में कोई नया अतिक्रमण नहीं हो। राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता अंजनी कुमार ने बताया कि इस आदेश के अनुपालन में हलफनामा दायर करने को कहा गया था, लेकिन आज को कोई हलफनामा दायर नहीं किया जा सका।

याचिकाकर्ता का कहना था कि मंदिर के पास के जल क्षेत्र में स्थानीय लोगों द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया है। इस वजह से इसकी सुरक्षा व्यवस्था और संरक्षण को लेकर खतरा उत्पन्न हो गया है। इस मामले में आगे की सुनवाई आगे भी की जाएगी।

गया पहाड़ी की सुरक्षा को लेकर याचिका दायर

पटना हाईकोर्ट ने विनय कुमार सिंह की जनहित याचिका को सुनते हुए केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई ) से पूछा है कि इस पुरातत्व स्थल के संरक्षण के लिए अब तक क्या कार्र्वाई की गई है।चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ विनय कुमार सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने कहा कि लोमस और याज्ञवल्क ऋषि की गुफाएं केवल ऐतिहासिक दृष्टि से ही नही, बल्कि जैव विविधता के मद्देनजर भी बेहद महत्वपूर्ण है । ऐसी जगह को संरक्षित करने की बजाए खत्म किया जा रहा है ।इसकी परवाह न तो केंद्र सरकार को है, न ही राज्य को है। इन पहाड़ के जंगल व आस पास होने वाले खनन कार्य पर हाई कोर्ट ने जो 20 जुलाई को रोक लगा दी थी। यह रोक को अगली सुनवाई तक जारी रखने का कोर्ट ने निर्देश दिया । सुनवाई के दौरान कुछ लोगों ने हस्तक्षेप अर्जी के जरिये खनन कार्य पर से रोक हटाने की गुहार लगाया , जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया ।

याचिकाकर्ता के वकील वृषकेतु पांडेय ने कोर्ट को बताया कि 1906 में छपी तत्कालीन गया जिले के गज़ट में दोनों पहाड़ियों का सिर्फ पुरातात्विक महत्त्व ही नही हैं, बल्कि वहां की जैव विविधता के बारे में भी अंग्रजों ने लिखा है।उन पहाड़ियों के 500 मीटर के दायरे में झरना , बरसाती नदी और एक फैला हुआ वन क्षेत्र है, जिसमे विविध प्रकार के वनस्पति और जीव- जंतु मिलते हैं ।

उस जंगल को अवैध खनन कर बर्बाद किया जा रहा है । लोमस और याज्ञवल्क पहाड़ियों को आर्कियोलॉजिकल एवम हेरिटेज साइट बनाने का कोर्ट से अनुरोध किया गया।

कोर्ट ने दोनों पहाड़ियों के वन क्षेत्र विस्तार और रिहाइशी बस्तियों के बिंदु पर राज्य व केंद्र सरकार से जवाब मांगा था । लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से कोई जवाब नही आया । मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी।

भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के परिवार भीख मांगने को हुए मजबूर

दुनिया जिसे जानती है भोजपुरी के शेक्सपियर के रूप में आज भी उसके परिजन बने हुए हैं _भिखारी भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के नाम पर हजारों लोग अमीर बन गए आज भी भिखारी ठाकुर के परिजन फटेहाल स्थिति में किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रहे हैं उनकी सुध लेने की फुर्सत ना राज्य सरकार को है और ना ही उन संस्थाओं को जो भिखारी ठाकुर के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों करोड़ों के अनुदान प्राप्त करते हैं.

लोक संस्कृति के वाहक कवि व भोजपुरी के शेक्सपियर माने जाने वाले भिखारी ठाकुर का जयंती 18 दिसंबर को मनाई जाती है ।लेकिन क्या कोई यकीन कर सकता है कि भक्तिकालीन भक्त कवियों व रीत कालीन कवियों के संधि स्थल पर कैथी लिपि में कलम चलाकर फिर रामलीला, कृष्णलीला, विदेशिया, बेटी-बेचवा, गबरघिचोरहा, गीति नाट्य को अभिनीत करने वाले लोक कवि भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के परिवार चीथड़ो में जी रहा हो। देश ही नहीं विदेशों में भोजपुरी के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करने वाले मल्लिक जी के परिवार गरीबी का दंश झेल रहा है। यह सच है कि उनके जयंति व पुण्यतिथि पर कुछ गणमान्य पहुंचते हैं, कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, लेकिन यह सब मात्र श्रद्धांजलि की औपचारिकता तक सिमट कर रह जाते हैं। न तो ऐसे किसी आयोजन में भिखरी ठाकुर के गांववासियों का दर्द सुना जाता है न ही उनके दर्द की दवा की प्रबंध की बात होती है।कुतुबपुर दियारा स्थित मल्लिक जी का खपरैल व छप्पर निर्मित जीर्ण-शीर्ण घर आज भी अपने जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है? यही से भिखारी ठाकुर ने काव्य सरिता प्रवाहित की थी और उनकी प्रसिद्धि की गूंज आज भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर सुनाई पड़ रही है।

भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील आज भी अदद चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए भटक रहा,कोई सुधी तक नहीं लेने वाला.भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील कुमार आज एक अदद चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए मारा-मारा फिर रहा है। दर्द भरी जुबान से सुशील बतातें हैं कि अगर फुआ और फुफा नहीं रहते तो शायद मैं एमए तक पढ़ाई नहीं कर पाता। रोटी की लड़ाई में मेरी पढ़ाई नेपथ्य में चली गई रहती। समहरणालय में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी की नौकरी के लिए वे आवेदन किये हैं। पैनल सूची में नाम भी है, लेकिन एक साल बीत गए, भगवान जाने नौकरी कब मिलेगी। हाल यह है कि विभिन्न कार्यक्रमों में उन्हें एवं उनके परिजन को मंच तक नहीं बुलाया जाता है।जिस दीपक की लौ से समाज में व्याप्त कुरीतियों और सामयिक संमस्याओं को उजागर करने का महती प्रयास भिखारी ठाकुर ने किया उनकी लौ में आज कई लोग रोटियां सेंक रहे हैं, लेकिन दीपक तले अंधेरे की कहावत चरितार्थ है। दबी जुबान से दिल की बात बाहर आती है कि भिखारी ठाकुर के नाम पर कई लोग वृद्धा पेंशन एवं सुख सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। परिवार को हरेक जरूरत की दरकार है। एक ओर जहां सुशील जीवकोपार्जन के लिए दर-दर भटक रहे हैं वहीं, उनकी पुत्रवधू व सुशील की मां गरीबी का दंश झेल रही है।

भिखरी ठाकुर के इकलौते पुत्र शीलानाथा ठाकुर थे। वे भिखारी ठाकुर के नाट्य मंडली व उनके कार्यक्रमों से कोई रूची नहीं थी। उनके तीन पुत्र राजेन्द्र ठाकुर, हीरालाल ठाकुर व दीनदयाल ठाकुर भिखारी की कला को जिन्दा रखे। नाटक मंडली बनाकर जगह-जगह कार्यक्रम करने लगे। लेकिन इसी बीच उनके बाबू जी गुजर गये। फिर पेट की आग तले वह संस्कार दब गई।अब तो राजेन्द्र ठाकुर भी नहीं रहे। फिलवक्त भिखारी ठाकुर के परिवार में उनके प्रपौत्र सुशील ठाकुर, राकेश ठाकुर, मुन्ना ठाकुर एवं इनकी पत्नी रहती है। जीर्ण-शीर्ण हालात में किसी तरह सत्ता व सरकार को कोसते जिंदगी जिये जा रहे हैं उनके परिजन.लोक साहित्य व संस्कृति के पुरोधा, भोजपुरी के शेक्सपीयर के गांव कुतुबपुर काश, स्थानीय सांसद व केन्द्रीय राज्य मंत्री रहे राजीव प्रताप रूढी के सांसद ग्राम योजना के तहत गोद में होता तो शायद पुरोधा के गांव को तारणहार की प्रतिक्षा नहीं होती। गंगा नदी नाव से उस पर छपरा से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित कुतुबपुर गांव आज भी अंधेरे तले है। कार्यक्रमों की रोशनी व राजनेताओं का आश्वासन उस गांव को रोशन नहीं कर सका। शायद श्रद्धांजलि सभा और सांस्कृतिक समारोह भी कुछ लोगों तक सीमट कर है। वरन्, सरकार दो फूल चढ़ाने में भी भिखारी ही रहा है। आस-पास दर्जनों गांव, हजारों की बस्ती, तीन पंचायतों में एक मात्र अपग्रेड हाईस्कूल। वह भी प्राथमिक विद्यालय से अपग्रेड हुआ है। प्रारंभिक शिक्षक और पढ़ाई हाईस्कूल तक। आगे की पढ़ाई के लिए नदी इस पर आना होता है। कुछ बच्चे तो आ जाते हैं, बच्चियां कहाँ जाये।

कुतुबपुर से सटे कोट्वापट्टी रामपुर, रायपुरा, बिंदगोवा व बड़हरा महाजी अन्य पंचायतें हैं। लोगों की जीविका का मुख्य आधार कृषि है। अब नदी इनके खेतों को निगलने लगी है। 75 फीसद भूमिखंड में सरयू, गंगा नदी का राग है। टापू सदृश गांव है। 2010 से निर्माणाधीन छपरा आरा पुल से कुछ उम्मीद जगी है, लेकिन फिलहाल नाव से आने-जाने की व्यवस्था है। अस्पताल है ही नहीं। बाढ़ की तबाही अलग से झेलना पड़ता है। प्रत्येक साल किसानों को परवल की खेती में बाढ़ आने पर लाखों-करोड़ों रूपयों का घाटा सहना पड़ता है। सुविधा के नाम पर इस गांव में पक्की सड़क तक नहीं है।छपरा- लोक कलाकार भिखारी ठाकुर जो समाज के न्यूनतम नाई वर्ग में पैदा हुए थे, वे अपनी नाटकों, गीतों एवं अन्य कला माध्यमों से समाज के हाशिये पर रहने वाले आम लोगों की व्यथा कथा का वर्णन किया है। अपनी प्रसिद्ध रचना विदेशिया में जिस नारी की विरह वर्णन एवं सामाजिक प्रताड़ना का उन्होंने सजीव चित्रण किया है। वही नारी आज साहित्यकारों एवं समाज विज्ञानियों के लिए स्त्री-विमर्श के रूप में चिन्तन एवं अध्यन का केन्द्र-बिन्दु बनी हुई है। भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, विषमता, भेदभाव के खिलाफ संघर्ष किया। इस तरह उन्होंने देश के विशाल भेजपुरी क्षेत्र में नवजागरण का संदेश फैलाया। बेमेल-विवाह, नशापान, स्त्रियों का शोषण एवं दमन, संयुक्त परिवार के विघटन एवं गरीबी के खिलाफ वे जीवनपर्यन्त विभिन्न कला माध्यमों के द्वारा संघर्ष करते रहे। यही कारण है कि इस महान कलाकार की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। कभी महापंडित राहुल सांकृत्यायन के जिन्हें साहित्य का अनगढ़ हीरा एवं भोजपुरी का शेक्सपीयर कहा था उस भिखारी ठाकुर का जन्म सरण जिले के छपरा जिले के सदर प्रखंड के कुतुबपुर दियारा में 18 दिसंबर 1887 को हुआ को हुआ था। उनके पिता का नाम दलश्रृंगार ठाकुर एवं माता का नाम शिवकली देवी था। भिखारी ठाकुर निरक्षर थे, परंतु उनकी साहित्य-साधना बेमिसाल थी। रोजी-रोटी कमने के लिए वे पश्चिम बंगाल के मेदनीपुर नामक स्थान पर गये जहां बंगाल के जातरा पाटियों के द्वारा किये जा रहे रामलीला के मंचन से वे काफी प्रभावित हुए, और उससे प्रेरणा पाकर उन्होंने नाच पार्टी का गठन किया।लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के समस्त साहित्य का संकलन अब तक पूरा नहीं हो सका है। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना के पूर्व निदेशक प्रो0 डॉ0 वीरेन्द्र नारायण यादव के प्रयास से परिषद ने रचनाओं का एक संकलन भिखारी ठाकुर ग्रंथावली के नाम से प्रकाशित किया है, परंतु अभी भी उनके लिए बहुत कुछ किये जाना बाकी है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में उनपर शोध-कार्य चल रहे हैं। कई पुस्तकें भी उनसे प्रकाशित हुई है।