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बीजेपी जातीय कुबना की राजनीति से बाहर निकल नहीं पायी चेहरा बदला है सोच वहीं पूरानी है

भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति में बिहार को जो भागीदारी मिली है उससे यह संकेत साफ है कि बिहार बीजेपी में सुशील मोदी ,नंद किशोर यादव,प्रेम कुमार,अश्वनी चौबे और सीपी ठाकुर युग का अब अंत हो गया है और अब पार्टी बिहार में संजय जयसवाल,गिरिराज सिंह ,नित्यानंद राय और मंगल पांडेय के सहारे आगे बढ़ेंगी ।

1—30 वर्षों बाद भी बीजेपी जातीय कुनबा वाली राजनीति से बाहर नहीं निकल पाया
बिहार में बीजेपी का दूसरा एरा लालू प्रसाद के सत्ता में आने के साथ ही 1990 से शुरू हुआ और उस दौर में सुशील मोदी पार्टी के युवा चेहरा हुआ करते थे झारखंड अलग होने के बाद उन्होंने कैलाशपति मिश्र के एरा को खत्म कर बीजेपी को सवर्ण और बनिया की पार्टी से बाहर निकालने की कोशिश शुरू किया।

हालांकि सुशील मोदी को भी इसमें खास सफलता हासिल नहीं हुई और यही वजह रहा कि सत्ता में बने रहने के लिए बीजेपी को आज भी नीतीश कुमार जैसे नेताओं की जरूरत है।

इस बार भी राष्ट्रीय कार्यसमिति में बिहार को जो भागीदारी मिली है उसको देखने से यही लगता है कि बीजेपी सिर्फ चेहरा बदला है सोच वही पुरानी है ।सुशील मोदी की जगह संजय जयसवाल ,सीपी ठाकुर की जगह गिरिराज सिंह ,नंद किशोर यादव की जगह नित्यानंद राय,अश्विनी कुमार चौबे की जगह मंगल पांडेय ,कीर्ति झा आजाद की जगह गोपाल जी ठाकुर और अति पिछड़ा प्रेम कुमार की जगह रेणु देवी को जगह दिया गया ,राजपूत नेता में टीम मोदी को राजीव प्रताप रूडी पसंद नहीं है ऐसे में इनके पास राधा मोहन सिंह को छोड़कर कोई दूसरा नेता है नहीं ।

2—- इन नये चेहरों से बिहार बीजेपी क्या साधना चाहती है
इन चेहरे के पीछे पार्टी की सोच को अगर देखे तो बीजेपी बिहार में गिरिराज सिंह के सहारे भूमिहार को साधना चाहती है, इनकी वैसी पहचान है क्या जो कैलाशपति मिश्र और सीपी ठाकुर का जगह ले सके । इसी तरह संजय जयसवाल कभी सुशील मोदी का जगह ले सकते हैं , मंगल पांडेय और गोपाल जी ठाकुर कभी भी बिहार बीजेपी के पुराने ब्राह्मण नेता की जगह ले सकते हैं।हलाकि नित्यानंद राय नंद किशोर यादव से यादव मतदाताओं के बीच ज्यादा प्रभावी हैं लेकिन नित्यानंद राय जब तक लालू प्रसाद का परिवार है यादव में उनका प्रवेश बहुत मुश्किल है।

फिर अति पिछड़े की बात करे तो रेणु देवा पर दाव लगाना उसी तरह है जैसे प्रेम कुमार 20 वर्षो से अधिक समय से विधायक और मंत्री रहे।
मतलब जिन नये चेहरे पर बीजेपी का केन्द्रीय नेतृत्व भरोसा जताया है उसमें फिलहाल वो क्षमता नहीं है जिसके सहारे बिहार में बीजेपी कुछ खास कर पाए ।

3—बीजेपी प्रभारी में बदलाव का क्या प्रभाव पड़ेगा बिहार की राजनीति पर
नरेन्द्र मोदी बिहार को लेकर काफी सावधान रहे हैं क्यों कि बिहार ऐसा पहला राज्य था जहां उनके पीएम रहने के बावजूद कुछ करिश्मा नहीं कर पाये, 2015 के विधानसभा चुनाव में पूरी कमान मोदी और शाह उठा रखे थे लेकिन पार्टी औंधे मुंह गिर गयी थी।

पीएम मोदी अभी भी सुशील मोदी को माफ करने को तैयार नहीं है ऐसे में टीम मोदी शुरु से ही सुशील मोदी के विकल्प में लगा हुआ है इस बार बिहार मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने के पीछे भी वजह यह रही है ।

हालांकि भूपेन्द्र यादव को जिस उद्देश्य बिहार का प्रभारी बनाया गया था उस उद्देश्य में बीजेपी कामयाब नहीं हो पाया पहली बार 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यादव को सबसे ज्यादा टिकट दिया लेकिन अधिकांश उम्मीदवार उनके हार गये।

नित्यानंद राय को गृह राज्यमंत्री बनाया गया फिर भी यादव वोटर को खीच नहीं पाये उलटे मध्य बिहार के इलाके में बीजेपी का जो परंपरागत वोट रहा है वो साथ छोड़ दिया हालांकि अंतिम समय में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को बिहार भेज करके नाराज सवर्ण वोटर को बनाने की कोशिश कि गयी थी लेकिन वो सफल नहीं हुआ तो अंत में चिराग को मैदान में उतरना पड़ा ।

ऐसे में हरीश द्विवेदी को बिहार का प्रभारी बनाये जाने से कोई बड़ा बदलाव होता नहीं दिख रहा क्यों कि बिहार में बीजेपी का जो कोर वोटर है सवर्ण और बनिया वही बीजेपी से खफा है और इसका लाभ राजद 2020 के विधानसभा चुनाव में बनिया को टिकट देकर उठा चुका है।

वही हरीश द्विवेदी के आने से यूपी में जदयू का बीजेपी के साथ गठबंधन होने में सहजता होगी ऐसा भी नहीं दिख रहा तो फिर हरीश द्विवेदी को बिहार का प्रभारी बनाये जाने के पीछे बीजेपी की सोच क्या है आगे आगे देखिए होता है क्या लेकिन इतना तो तय दिख रहा है कि इस टीम से बीजेपी की निर्भरता नीतीश पर हमेशा बनी रहेगी ।

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