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बिहार में खुल गया 8 वीं तक का स्कूल

आज बिहार में कक्षा 1 से 8 तक का स्कूल खुल गया है
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान राज्य सरकार ने प्राथमिक विधालय से लेकर कॉलेज तक को बंद कर दिया था ।
कोरोना का लहर कमजोर पड़ने पर जुलाई में राज्य सरकार ने कॉलेज और 11 वीं तक की कक्षा को खोल दिया था और आज से कक्षा 1 से 8 वीं तक का स्कूल आज यानी 16 अगस्त से खुल गया । छोटे बच्चों के स्कूलों को लेकर सरकार ने सुरक्षा को लेकर विशेष सावधानी के निर्देश दिए हैं। नए आदेश के तहत बच्चों से शिक्षक की दूरी पर भी विशेष ध्यान देने को कहा गया है। बुक से लेकर बच्चों की अन्य पाठ्य सामग्री को हाथ लगाने से पहले शिक्षक को हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना होगा।
जो भी स्कूल इस आदेश का अनुपालन नहीं करेगा उस पर कठोर कारवाई की जायेगी ।

संसद की कार्यशैली जिम्मेवार

संसद के कार्यशैली पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायधीश ने उठाया सवाल कहा मुकदमे को लेकर कोर्ट पर दवाब संसद के कार्यशैली की वजह से बढ़ा है।

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सीजेआई एनवी रमना ने आज कहा है कि ‘ऐसा लगता है कि आज संसद में कानून बनाते समय गुणवत्ता वाली बहस का अभाव होता है। इससे बहुत सारी मुकदमेबाजी होती है और अदालतें गुणवत्तापूर्ण बहस के अभाव में नए कानून के पीछे की मंशा और उद्देश्य को समझ पाने में असमर्थ रहते हैं।’ जस्टिस रमना के मुताबिक ‘कानूनों में बहुत अस्पष्टता’ की वजह से मुकदमेबाजी को बढ़ावा मिला है, जिससे नागरिकों के साथ-साथ अदालतों और दूसरे संबंधित लोगों के लिए भी परेशानियां पैदा हुईं।

चीफ जस्टिस ने साफ शब्दों में कहा कि, ‘कानूनों में कोई स्पष्टता नहीं है। हम नहीं जानते कि कानूनों को किस उद्देश्य से बनाया गया है। इसके चलते ढेर सारी मुकदमेबाजी होती है, सरकार को परेशानी और नुकासन होता है, साथ ही साथ लोगों को भी परेशानी होती है। अगर सदनों में बुद्धिजीवी और वकील जैसे पेशेवर न हों तो यही होता है।’ जस्टिस रमना ने कहा कि आजादी के बाद संसद में बड़ी संख्या में वकील मौजूद होते थे और शायद इसी वजह से गुणवत्तापूर्ण बहस होते थे। उन्होंने कहा है कि ‘वकील समुदाय को फिर से सार्वजनिक जीवन में समर्पित होना चाहिए और संसदीय बहसों में बदलाव लाना चाहिए।’

२१वीं सदी में कहाँ खड़ा है बिहार ।

90 का वो दशक था जब मैं बड़ी हो रही थी और सक्रियता से अपने आस-पास के माहौल का अवलोकन कर रही थी। सरकारी उच्च विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में ना के बराबर कक्षाएं चल रही थी। इसलिए ‘अच्छे’ बच्चे उसमें जाना नहीं चाहते थे। आर्थिक वातावरण भी मंदा था। उच्च मध्यमवर्गीय एवं उच्चवर्गीय बच्चे उभरते हुए अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों (जिसमें काम चलाने योग्य शिक्षक कम वेतन पर पढ़ाते थे) में जाते थे। जो परिवार कर सकते थे, वो बच्चों के चलते किसी तरह आर्थिक जुगाड़ करके राज्य से बाहर भेजने की कोशिश में रहते थें। अपहरण के उस दौर में ऐसा करना उनके लिए मजबूरी भी थी जो भी थोड़ा बहुत कमाते थे। और इस तरह घर छूटने की शुरुआत हो जाती थी। हालांकि उस समय इसे स्टेटस सिंबल माना जाता था (लेकिन, बाद में समझ में आया कि अपने ही राज्य में अवसर क्यों नहीं उपलब्ध थे, चाहे अच्छी शिक्षा के लिए हो या काम के लिए)!


और, इस मामले में भी लड़का व लड़की में अंतर किया जाता था। सामान्यतः लड़कियां लड़कों से कमतर समझी जाती थीं। बेटा न हुआ तो उस परिवार को बेचारगी की दृष्टि से देखा जाता था। गुंडे-मवालियों का मन बढ़ जाता था और ऐसे परिवार (अगर तथाकथित पिछड़ी जाति के हों तो और मुश्किल) इजी टारगेट होते थे, चाहे वह आय का मामला हो या संपत्ति का।पुलिस-प्रशासन से भी कोई ज्यादा उम्मीद नहीं थी।
खैर बात हो रही थी अवसर की, बाहर भेजे जाने के मामले में भी लड़कियों को पीछे रखा जाता था क्योंकि लड़की को पराया धन माना जाता था और दहेज के लिए पैसे बचा कर रखने की प्रवृत्ति थी जो काफी हद तक अभी भी है। अगर कोई मध्यमवर्गीय परिवार असाधारण रूप से अपनी बेटी को बाहर पढ़ने के लिए भेजने की सोचता तो समाज के लोग कई तरह से समझाने लगते थे जैसे, बाहर जाएगी तो बिगड़ जाएगी, ज्यादा पढ़ लेगी तो उस योग्य वर मिलना मुश्किल हो जाएगा इत्यादि।

लड़का और लड़की में दूरी रखने को कहा जाता था अर्थात लड़के का दोस्त लड़का तथा लड़की की दोस्त लड़की होनी चाहिए। लड़कों से मेल-जोल पर परिवार की भौंहे चढ़े न चढ़े, पड़ोसियों की चढ़ जाती थी। जैसे जैसे लड़की बड़ी होती थी, घर के काम की ट्रेनिंग बढ़ती जाती थी। और हर बात में कहा जाता था कि ससुराल से ताना न सुनना पड़े। लड़कों के लिए अमूमन ऐसा ना था। कपड़ों के मामले में भी लड़कियों को अधिक से अधिक ढका हुआ अच्छा माना जाता था। मुझे खुद याद है कि इन सब चीजों से चिढ़कर मैंने अचानक एक दिन ब्वॉय-कट बाल कटवा लिए थे। फिर जींस का मुझे पता चला तो पापा से इजाजत लेने के लिए बहुत तरीके से प्रयास करने पड़े थे।

लगभग एक दशक बाद कुछ परिवर्तन तो अवश्य हुए हैं। महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम तो हुआ है, भले ही काफी हद तक प्रतीकात्मक ही सही। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है, स्कूली पोशाक में लड़कियों का (झुंड के झुंड में) साइकिल से पढ़ने जाना। पहले के प्रावधानों के अलावा अभी हाल में मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना आदि का प्रावधान किया गया है जिसके पीछे मंशा तो सकारात्मक हो सकती है, लेकिन असल सशक्तिकरण नहीं हो पा रहा है। अगर हम ईमानदारी से यह पूछे कि क्या हमारी आधी आबादी सशक्त होने की राह पर है, उत्तर पता चल जाएगा? और प्रतीकात्मक मैंने इसीलिए कहा क्योंकि असल उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना होना चाहिए, पर ऐसा हो नहीं रहा है। कक्षा में बच्चों का न होना बहुत कुछ कहता है। शिक्षकों की कमी सभी जानते हैं।


बच्चों में किताब पढ़ने का रुझान कम हो रहा है। पुस्तकालय बुरी स्थिति में है या यों कहें कि अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बच्चें पढ़ाई के लिए काफी हद तक निजी कोचिंग संस्थानों/ट्यूशन पर आश्रित हो गए हैं जो कि अच्छा संकेत नहीं है, जैसे यह असमानता को बढ़ाता है। अभी भी अच्छा टैलेंट राज्य से बाहर चला जाता है, जो कि ब्रेन ड्रेन समस्या का परिचायक है। उद्यमिता के अनुकूल माहौल नहीं होने से सरकारी नौकरी पर दबाव बढ़ जाता है और उसके भी अवसर कम हैं।

कुल मिलाकर कहे तो दुनिया जिस गति से आगे बढ़ रही है, बिहार उस मामले में काफी पीछे है। मानव विकास सूचकांक पर हम कहां हैं, सब जानते हैं। एक-डेढ़ दशक में कुछ तो बदलाव बिहार में हुए हैं, लेकिन वह काफी नहीं है। बिहार वर्तमान में देश का सबसे युवा राज्य है, लेकिन कमियों के चलते जनसांख्यिकीय लाभांश उठाने में काफी हद तक असफल हैं।


लेखिका प्रो० लक्ष्मी कुमारी
राजीतिक विज्ञान ,आरा विश्वविधालय

बिहार में बड़ा हादसा हाईटेंशन तार से टकराई नाव ,करंट लगने के 25 लोग झुलसे कई लोग लापता

घटना पटना जिले के कच्ची घाट से जुड़ा हुआ है जहां देर रात रोजमर्रा का काम करके नाव से लौट रहे लोग उस वक्त सकते में आ गये जब गंगा के मझधार में पास कर रहे हाईटेंशन तार से नाव टकरा गयी ।

देखते देखते पूरे नाव में करंट प्रभाव करने लगा जिस वजह से 25 लोग झुलस गये हैं जिसमें दो की हालत गम्भीर है । प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक रात करीब साढ़े नौ बजे एक नाव कच्ची दरगाह से वैशाली के रुस्तमपुर राघोपुर के लिए खुली। उस नाव पर करीब पचास से अधिक लोग सवार थे। गंगा के ऊपर से हाईटेंशन लाइन गुजरी है। गंगा में ऊफान के चलते हाईटेंशन लाइन की ऊंचाई बेहद कम हो गई है। नाव जैसे ही वैशाली सीमा के मझधार में पहुंची, अंधेरा होने के कारण नाविक को पता नहीं चला और नाव की पतवार ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन तार से टकरा गई।


हादसे की सूचना मिलते स्थानीय लोगों ने दूसरी नाव से लोगों को मदद पहुंचानी शुरू की। गंगा में कूदे लोगों और करंट से घायल लोगों को किनारे लाकर घायलों को विभिन्न निजी नर्सिंग होम में इलाज के लिए भर्ती कराया।
बचाव एवं राहत कार्य में बड़ी संख्या में प्रशासनिक अधिकारी जुट गए। डीएसपी फतुहा  के अनुसार, घायलों का इलाज पटना के कच्ची दरगाह स्थित अलग-अलग नर्सिंग होम में चल रहा है। गंभीर रूप से घायलों का एनएमसीएच में भी इलाज चल रहा है। घटनास्थल पर पटना सिटी और वैशाली के एसडीओ और एसडीपीओ 4 अधिकारी दल बल के साथ मौजूद हैं। लापता यात्रियों की खोजबीन SDRF की टीम मदद से की जा रही है।

बिहार इस बार भी वीरता पदक से चूका

हर वर्ष की भाती स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के जांबाज पुलिस पदाधिकारियों को दी जाने वाली विरता पुरस्कार( गैलेंट्री पुलिस पदक)में इस बार भी बिहार का नाम नहीं है जबकि विराता पुरस्कार के इतिहास की बात करे तो बिहार हमेशा दो तीन पदक लेता रहा है।

 गृह मंत्रालय हर साल स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश के सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेश की पुलिस सेवा से जुड़े पदाधिकारियों व कर्मियों के लिए पदक की घोषणा करती है। यह पदक चार श्रेणी में दिए जाते हैं। राष्ट्रपति का गैलेंट्री पुलिस पदक, गैलेंट्री पुलिस पदक, राष्ट्रपति का विशिष्ट सेवा पदक व सराहनीय सेवा पदक।

स्वतंत्रता दिवस पर इस वर्ष बिहार के 23 पुलिस पदाधिकारियों व कर्मियों को गृह मंत्रालय की ओर से सेवा पदक के लिए चुना गया है। दो पुलिस पदाधिकारियों को विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक जबकि डीएसपी सुबोध कुमार समेत 21 को सराहनीय पुलिस सेवा पदक दिया जाएगा। आर्थिक अपराध इकाई, पटना में पुलिस निरीक्षक विपिन कुमार सिंह और पटना जिला बल में पुलिस अवर निरीक्षक राम कुमार सिंह को विशिष्ट सेवा पदक के लिए चुना गया है। बिहार के डीजीपी एसके सिंघल ने विशिष्ट व सराहनीय सेवा पदक पाने वाले पुलिस पदाधिकारियों व कर्मियों को बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य

इन्हें मिला सराहनीय सेवा पदक
– सुबोध कुमार, डीएसपी मद्यनिषेध,
– आनंद कुमार सिंह एसआइ सहरसा,
– राज नारायण यादव एएसआइ पटना,
– सुधाकर सिंह, एसआइ पूर्णिया,
– अर्जुन बेसरा एसआइ, रेल कटिहार,
– शत्रुघ्न पटेल, एसआइ कैमूर,
– अरुण कुमार झा, एसआइ दरभंगा,
– कुमार अजीत सिंह, एएसआइ सीआइडी,
– संजय कुमार यादव, एएसआइ सीआइडी,
– उमेश पासवान, एएसआइ एसटीएफ,
– अजय कुमार द्विवेदी, एएसआइ पुलिस मुख्यालय,
– अमेंद्र कुमार गुप्ता, एएसआइ मद्यनिषेध इकाई,
– अनिल कुमार सिंह, हवलदार एटीएस,
– अरुण कुमार सिंह, चालक हवलदार एटीएस,
– मो. रिजवान अहमद, हवलदार बीएसएपी-10,
– विनय कुमार सिंह, हवलदार सिवान,
– लालबाबू सिंह हवलदार बीएसएपी-14,
– बलराम सिंह, चालक सिपाही बीएसएपी-10,
– हरेंद्र कुमार चौधरी, सिपाही नालंदा,
– रामकुमार शर्मा, सिपाही सीआइडी,
– संजय कुमार सिपाही गोपालगंज।

गैलेंट्री पुलिस पदक नहीं मिलने को लेकर जब राज्य के डीजीपी से सवाल किया गया तो कहां कि हमारे राज्य में जांबाज पुलिस अधिकारियों की कोई कमी है कभी कभी ऐसा होता है वैसे विरता पदक का एक अलग ही महत्व है ।

स्वतंत्रता दिवस पर राजधानी पटना में हाई अलर्ट: सुरक्षा चाक-चौबंद

राजधानी पटना में 15 अगस्त पर अशांति का खतरा है। इंटेलिजेंस से मिले इनपुट के बाद पटना में हाई अलर्ट कर दिया गया है। झंडोत्तोलन कार्याक्रम के दौरान गांधी मैदान के अंदर से लेकर बाहर तक खुफियां निगरानी कराई जाएगी। चप्पे-चप्पे पर मजिस्ट्रेट, पुलिस पदाधिकारी और पुलिस बल को तैनात किया गया है। ताकि स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन शांतिपूर्ण हो सके। DM और SSP ने संयुक्त आदेश जारी कर सुरक्षा को लेकर विशेष अलर्ट किया है।

पटना के आयुक्त संजय कुमार अग्रवाल का कहना है- ‘किसी भी दशा में अफवाह फैलाने वालों और अशांति पैदा करने वालों का मंसूबा सफल नहीं होगा’। आयुक्त ने तैनात सभी दंडाधिकारी और पुलिस पदाधिकारी को अपने दायित्व का शत-प्रतिशत पालन करने का निर्देश दिया है। साथ ही विशेष रूप से अफवाह फैलाने वाले, शांति भंग करने वाले व्यक्तियों पर पैनी नजर रखने को कहा है।