कि यह परिवर्तन अक्टूबर के मध्य में दुर्गा पूजा से पहले या उसके बाद होगा, और वे सभी भाजपा का झंडा थामेंगे। इस बयान ने तत्काल ही राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी, क्योंकि यह भारतीय राजनीति में संभावित बड़े बदलाव का संकेत था।
इस घोषणा के पहले, बसुनिया ने अपने राजनीतिक सफर की पृष्ठभूमि
का उल्लेख किया। वह 1999 में टीएमसी के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत करते हैं और कई बार विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कूचबिहार से उन्होंने दो बार लगातार जीत दर्ज की, जिससे वह पार्टी के प्रमुख चेहरों में शुमार हो गए। पिछले दो वर्षों में, टीएमसी के भीतर शासी ढांचे
के साथ उनके संबंध बिगड़ते गए, जिसके कारण उन्होंने बागी आंदोलन में हिस्सा लिया और कई बार पार्टी के नेतृत्व को आलोचना की। यह पृष्ठभूमि इस बात को स्पष्ट करती है कि उनका इस तरह का बड़ा कदम क्यों सोचा जा सकता है।
बागी नेताओं के बीच चल रहे विवाद की जड़ में पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष, गठबंधन
नीति और संसदीय सीटों के आवंटन का सवाल है। टीएमसी ने पिछले साल के विधानसभा चुनाव में कई प्रमुख क्षेत्रों में हार झेली, जिससे आंतरिक असंतोष बढ़ा। विशेषकर पश्चिम बंगाल में, जहाँ टीएमसी का दाब मजबूत है, बागी नेताओं ने कई बार कहा कि पार्टी की रणनीति अब पुरानी हो गई है। इस संदर्भ में बसुनिया का बयान एक
रणनीतिक संकेत माना गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह अपने राजनीतिक भविष्य को पुनः स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
बसुनिया के इस दावे के बाद, उन्होंने अपने समर्थकों को एकत्रित किया और कहा कि ये सभी सांसद नई गठबंधन में शामिल होकर भाजपा के साथ मिलकर राज्य विकास की नई राह तय करेंगे। उन्होंने यह
भी बताया कि यह बदलाव केवल व्यक्तिगत कारणों से नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक विकास के हित में किया जा रहा है। इस दौरान, बसुनिया ने कई वरिष्ठ बागी सांसदों के नाम भी उजागर किए, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि उनके दावे में कुछ हद तक वास्तविकता हो सकती है।
वहीं, पश्चिम बंगाल प्रदेश भाजपा
के अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने तुरंत ही इस दावे को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा कोई भी राजनैतिक दल में बंटवारा करने वाले बागी सांसदों को नहीं लेती, और यह बयान केवल राजनीति का एक खेल है। भट्टाचार्य ने कहा कि पार्टी के सिद्धांत और नैतिकता के दायरे में किसी भी तरह के ‘दलबदल’ को नहीं सहारा
जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि अगर कोई सांसद वास्तव में भाजपा में शामिल होना चाहता है, तो उसे उचित प्रक्रियाओं और विचार-विमर्श के बाद ही यह कदम उठाना चाहिए।
भट्टाचार्य के इस बयान के बाद, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पार्टी की नीति हमेशा से स्पष्ट रही है: हम
किसी भी दल के बागी सदस्य को अपनी छत्रछाया में नहीं लेंगे। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाजपा का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय एकता और विकास है, न कि राजनैतिक दलबदल। इस प्रकार, भाजपा ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि वह बसुनिया के दावे को वास्तविकता में बदलने के लिए तैयार नहीं है।
ट्रैक्टर-फ्रंटलाइन पर मौजूद कई राजनीतिक
विश्लेषकों ने भी इस घटनाक्रम पर टिप्पणी की। एक प्रमुख विश्लेषक ने कहा कि बसुनिया का दावा सिर्फ एक रणनीतिक चाल हो सकता है, जिससे वह अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूती प्रदान कर सकें। उन्होंने यह भी जोड़ते हुए कहा कि यदि इस दावे के पीछे वास्तविक योजना है, तो यह राज्य राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता
है, जिससे भाजपा और टीएमसी दोनों को पुनः अपनी रणनीति पर विचार करना पड़ेगा।
दूसरे विश्लेषकों ने यह तर्क दिया कि बसुनिया के दावे को साकार करना कठिन होगा, क्योंकि पार्टी के भीतर गहरे संबंध और व्यक्तिगत स्वार्थ जटिल हैं। उन्होंने बताया कि कई बागी सांसद पहले ही अपने मतदाताओं के भरोसे को नुकसान पहुँचाने से बचते हुए टीएमसी
में ही बने हुए हैं। इस प्रकार, बसुनिया का दावा वास्तविकता में बदलना पार्टी के भीतर की शक्ति संरचना को बाधित कर सकता है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।
राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर ने भी इस पर विचार किया और कहा कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इस तरह के बड़े दलबदल दुर्लभ रहे हैं। उन्होंने कहा
कि यदि इस दावे में सच्चाई है, तो यह भारतीय राजनीति में एक नया चरण खोल देगा, जहाँ बड़े दलों के बीच गठबंधन और पुनर्गठन की संभावना बढ़ेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में मतदाता की आवाज़ और स्थानीय मुद्दों का महत्व बढ़ेगा, क्योंकि
Updated: September 14, 2026
Trinamool rebel MP Jagdish Chandra Barman claimed that out of twenty legislators planning to quit for the Congress, seventeen will join the BJP around mid‑October, prompting sharp denials from the BJP leadership. Analysts view the statement as a high‑stakes political gambit that could reshape Uttar Pradesh’s party dynamics if it materialises.
Basundia’s “17‑to‑BJP” claim reads less as a genuine defection plan and more as a high‑stakes bargaining chip to force the Trinamool leadership into concessions before the next electoral cycle. If the maneuver stalls, it could still destabilize regional alliances, prompting both the T