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बागी सांसद बर्मा बसुनिया का दावा: 17 सांसद टीएमसी छोड़कर भाजपा में शामिल होंगे

पिछले सप्ताहांत के शाम के समय, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने उत्तर प्रदेश के एक छोटे हॉल में आयोजित सभा में एक चौंकाने वाला दावा रखा कि टीएमसी छोड़कर राष्ट्रीय कांग्रेस (एनसीपीआई) में शामिल होने वाले बीस सांसदों में से सत्रह सांसद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो जाएंगे। बसुनिया ने कहा

कि यह परिवर्तन अक्टूबर के मध्य में दुर्गा पूजा से पहले या उसके बाद होगा, और वे सभी भाजपा का झंडा थामेंगे। इस बयान ने तत्काल ही राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी, क्योंकि यह भारतीय राजनीति में संभावित बड़े बदलाव का संकेत था।

इस घोषणा के पहले, बसुनिया ने अपने राजनीतिक सफर की पृष्ठभूमि

का उल्लेख किया। वह 1999 में टीएमसी के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत करते हैं और कई बार विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कूचबिहार से उन्होंने दो बार लगातार जीत दर्ज की, जिससे वह पार्टी के प्रमुख चेहरों में शुमार हो गए। पिछले दो वर्षों में, टीएमसी के भीतर शासी ढांचे

के साथ उनके संबंध बिगड़ते गए, जिसके कारण उन्होंने बागी आंदोलन में हिस्सा लिया और कई बार पार्टी के नेतृत्व को आलोचना की। यह पृष्ठभूमि इस बात को स्पष्ट करती है कि उनका इस तरह का बड़ा कदम क्यों सोचा जा सकता है।

बागी नेताओं के बीच चल रहे विवाद की जड़ में पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष, गठबंधन

नीति और संसदीय सीटों के आवंटन का सवाल है। टीएमसी ने पिछले साल के विधानसभा चुनाव में कई प्रमुख क्षेत्रों में हार झेली, जिससे आंतरिक असंतोष बढ़ा। विशेषकर पश्चिम बंगाल में, जहाँ टीएमसी का दाब मजबूत है, बागी नेताओं ने कई बार कहा कि पार्टी की रणनीति अब पुरानी हो गई है। इस संदर्भ में बसुनिया का बयान एक

रणनीतिक संकेत माना गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह अपने राजनीतिक भविष्य को पुनः स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

बसुनिया के इस दावे के बाद, उन्होंने अपने समर्थकों को एकत्रित किया और कहा कि ये सभी सांसद नई गठबंधन में शामिल होकर भाजपा के साथ मिलकर राज्य विकास की नई राह तय करेंगे। उन्होंने यह

भी बताया कि यह बदलाव केवल व्यक्तिगत कारणों से नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक विकास के हित में किया जा रहा है। इस दौरान, बसुनिया ने कई वरिष्ठ बागी सांसदों के नाम भी उजागर किए, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि उनके दावे में कुछ हद तक वास्तविकता हो सकती है।

वहीं, पश्चिम बंगाल प्रदेश भाजपा

के अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने तुरंत ही इस दावे को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा कोई भी राजनैतिक दल में बंटवारा करने वाले बागी सांसदों को नहीं लेती, और यह बयान केवल राजनीति का एक खेल है। भट्टाचार्य ने कहा कि पार्टी के सिद्धांत और नैतिकता के दायरे में किसी भी तरह के ‘दलबदल’ को नहीं सहारा

जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि अगर कोई सांसद वास्तव में भाजपा में शामिल होना चाहता है, तो उसे उचित प्रक्रियाओं और विचार-विमर्श के बाद ही यह कदम उठाना चाहिए।

भट्टाचार्य के इस बयान के बाद, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पार्टी की नीति हमेशा से स्पष्ट रही है: हम

किसी भी दल के बागी सदस्य को अपनी छत्रछाया में नहीं लेंगे। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाजपा का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय एकता और विकास है, न कि राजनैतिक दलबदल। इस प्रकार, भाजपा ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि वह बसुनिया के दावे को वास्तविकता में बदलने के लिए तैयार नहीं है।

ट्रैक्टर-फ्रंटलाइन पर मौजूद कई राजनीतिक

विश्लेषकों ने भी इस घटनाक्रम पर टिप्पणी की। एक प्रमुख विश्लेषक ने कहा कि बसुनिया का दावा सिर्फ एक रणनीतिक चाल हो सकता है, जिससे वह अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूती प्रदान कर सकें। उन्होंने यह भी जोड़ते हुए कहा कि यदि इस दावे के पीछे वास्तविक योजना है, तो यह राज्य राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता

है, जिससे भाजपा और टीएमसी दोनों को पुनः अपनी रणनीति पर विचार करना पड़ेगा।

दूसरे विश्लेषकों ने यह तर्क दिया कि बसुनिया के दावे को साकार करना कठिन होगा, क्योंकि पार्टी के भीतर गहरे संबंध और व्यक्तिगत स्वार्थ जटिल हैं। उन्होंने बताया कि कई बागी सांसद पहले ही अपने मतदाताओं के भरोसे को नुकसान पहुँचाने से बचते हुए टीएमसी

में ही बने हुए हैं। इस प्रकार, बसुनिया का दावा वास्तविकता में बदलना पार्टी के भीतर की शक्ति संरचना को बाधित कर सकता है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।

राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर ने भी इस पर विचार किया और कहा कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इस तरह के बड़े दलबदल दुर्लभ रहे हैं। उन्होंने कहा

कि यदि इस दावे में सच्चाई है, तो यह भारतीय राजनीति में एक नया चरण खोल देगा, जहाँ बड़े दलों के बीच गठबंधन और पुनर्गठन की संभावना बढ़ेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में मतदाता की आवाज़ और स्थानीय मुद्दों का महत्व बढ़ेगा, क्योंकि

Updated: September 14, 2026


Trinamool rebel MP Jagdish Chandra Barman claimed that out of twenty legislators planning to quit for the Congress, seventeen will join the BJP around mid‑October, prompting sharp denials from the BJP leadership. Analysts view the statement as a high‑stakes political gambit that could reshape Uttar Pradesh’s party dynamics if it materialises.

Basundia’s “17‑to‑BJP” claim reads less as a genuine defection plan and more as a high‑stakes bargaining chip to force the Trinamool leadership into concessions before the next electoral cycle. If the maneuver stalls, it could still destabilize regional alliances, prompting both the T

तेजस्वी यादव ने “आरक्षण को समाप्त करने वाला अभी पैदा नहीं हुआ” कहा, भाजपा‑आरएसएस‑एनडीए नेताओं पर तीखा प्रहार; बिहार में आर

बिहार में आरक्षण मुद्दे पर राजनीतिक जलवायु तीव्र हो गई है, जब प्रतिपक्ष नेता तेजस्वी यादव ने पटना हवाई अड्डे पर पत्रकारों के सवालों के जवाब में केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और संतोष सुमन के बीच चल रहे विवाद पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “आरक्षण को समाप्त करने वाला अभी

पैदा नहीं हुआ” और इस पर चर्चा को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए, बीआरएस, आरएसएस और एनडीए के नेताओं को निशाना बनाया। उनका यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि आरक्षण नीति पर अब भी राजनीतिक संग्राम जारी है, जिससे सामाजिक वर्गों में तनाव बढ़ रहा है।

आरक्षण का इतिहास भारत

के सामाजिक-आर्थिक असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से शुरू हुआ था, लेकिन बीते दशकों में इस नीति पर लगातार विवाद और कानूनी चुनौतियाँ सामने आई हैं। 1990 के दशक में उच्च शिक्षा में आरक्षण की घोषणा से लेकर 2020 में न्यायालय द्वारा कुछ संशोधनों तक, इस नीति ने कई सामाजिक वर्गों के अधिकारों

को संरक्षित किया है। बिहार में सामाजिक संरचना की जटिलता, जातीय विविधता और आर्थिक असमानताओं ने आरक्षण को एक संवेदनशील मुद्दा बना दिया है, जिससे हर चुनावी चक्र में यह विषय फिर से उभरता है।

तेजस्वी यादव का बयान इस पृष्ठभूमि में उभरा, जब बिहार सरकार ने हाल ही में आरक्षण प्रतिशत में

संशोधन की घोषणा की थी, जिससे विपक्षी दलों ने तीखा विरोध किया। इस विवाद के दौरान, कई राजनेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में आरक्षण को लेकर अलग-अलग रुख अपनाया, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में भी इस मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई। यह परिप्रेक्ष्य दर्शाता है कि आरक्षण केवल सामाजिक न्याय का सवाल नहीं, बल्कि राजनीतिक

समीकरणों में भी एक प्रमुख तत्व बन गया है, जो सत्ता और विरोध दोनों को प्रभावित करता है।

पिछले सप्ताह, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने एक सार्वजनिक सभा में कहा कि आरक्षण नीति को निरंतर सुधार की जरूरत है, लेकिन उसे समाप्त नहीं किया जा सकता। उनका यह बयान राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक

संतुलन बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करता है। इसके तुरंत बाद, जीतन राम मांझी ने अपने मंच से कहा कि आरक्षण को हटाने की मांग केवल राजनीतिक लाभ के लिये की जा रही है, और यह सामाजिक असमानता को बढ़ा सकती है। इस बीच, संतोष सुमन ने भी इस मुद्दे पर अपने पक्ष

को स्पष्ट किया, यह कहते हुए कि आरक्षण को हटाना अनुचित होगा।

तेजस्वी यादव ने इन सभी बयानों के बीच अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि “आरक्षण को समाप्त करने वाला अभी पैदा नहीं हुआ” और यह संकेत दिया कि इस दिशा में कोई भी निर्णय तत्काल नहीं लिया जा सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण की समाप्ति के पीछे की विचारधारा समाज को दरकिनार कर सत्ता के लिए कुर्सी पाने की इच्छा है। उनका यह वक्तव्य राजनीतिक मंच पर विवाद को और तीखा करता है, जिससे आगामी चुनावी माहौल में आरक्षण मुद्दा मुख्य आकर्षण बन जाएगा।

दूसरी ओर, बीआरएस के प्रमुख नेता

ने तेजस्वी यादव के इस बयान को “भ्रष्ट राजनीति” का उदाहरण बताया और कहा कि आरक्षण को हटाने की कोशिश सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों को कमजोर करेगी। इस बीच, एनडीए के वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि आरक्षण नीति को सुदृढ़ करने के लिये नई पहल की जरूरत है, न कि इसे समाप्त करने

की। इस तरह के बहुपक्षीय बयानों ने राष्ट्रीय स्तर पर आरक्षण पर नई बहस को जन्म दिया है।

बिहार के सामाजिक संगठनों ने भी तेजस्वी यादव के बयान पर प्रतिक्रिया दी। कुछ संगठन ने कहा कि आरक्षण को हटाने की कोई भी पहल सामाजिक असमानता को बढ़ा देगी, जबकि अन्य ने कहा कि

आरक्षण प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है, न कि उसके समाप्ति की। इस बीच, छात्र समूहों ने अपने समर्थन में मार्च आयोजित किए, जिसमें उन्होंने आरक्षण की महत्ता पर बल दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव का यह बयान आगामी विधानसभा चुनावों में उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

वे इस मुद्दे को लेकर विभिन्न वर्गों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे सामाजिक आधार को मजबूत किया जा सके। इस प्रकार, आरक्षण को लेकर राजनीतिक मंच पर उठाए गए शब्द चुनावी राजनीति की नई दिशा को संकेतित करते हैं।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो आरक्षण नीति का प्रभाव

रोजगार और शिक्षा में विविधता लाने में महत्वपूर्ण रहा है। यदि इस नीति में कटौती या समाप्ति की दिशा में कदम उठाया जाता है, तो आर्थिक असमानताएं बढ़ सकती हैं, जिससे सामाजिक तनाव भी बढ़ेगा। इस कारण से नीति निर्माताओं को आर्थिक डेटा और सामाजिक प्रभाव का संतुलित विश्लेषण करना

Updated: August 30, 2026

The remarks revive a longstanding debate on reservation, highlighting its impact on social equity and political dynamics in Bihar.
Their prominence may influence policy discussions and voter alignments ahead of upcoming state elections.