Bihar News: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में चल रहे विरोध के बीच सोमवार, 28 सितंबर 2026 को पटना में वाम दलों और विभिन्न जनसंगठनों ने जन आक्रोश मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को रोकने और कथित तौर पर बाहर किए गए मतदाताओं के अधिकार बहाल करने की मांग उठाई। गांधी मैदान से राजभवन की ओर बढ़ रहे मार्च को पुलिस ने जेपी गोलंबर के पास बैरिकेडिंग लगाकर रोकने की कोशिश की। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश की और पुलिस के साथ धक्कामुक्की हुई।
क्या है पूरा मामला?
वाम दलों का यह विरोध केवल पटना तक सीमित नहीं है। CPI(M), CPI, CPI(ML)-Liberation, All India Forward Bloc और Revolutionary Socialist Party ने 24 सितंबर को संयुक्त बयान जारी कर CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने, SIR तत्काल रोकने और जिन मतदाताओं को गलत तरीके से सूची से बाहर किया गया है उनके मतदान अधिकार बहाल करने की मांग की थी। इन दलों ने 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक देशव्यापी विरोध कार्यक्रम का आह्वान किया है।
वाम दलों का यह रुख उस रिपोर्ट के बाद और तेज हुआ जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के मुताबिक ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा से जुड़े मामलों से संबंधित थीं।
हालांकि, इन रिपोर्टों की व्याख्या को लेकर चुनाव आयोग का पक्ष अलग है। आयोग से जुड़े अधिकारियों ने कथित आंतरिक मतभेद की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा है कि SIR और अन्य फैसले आयोग की सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
पटना में क्या हुआ?
सोमवार को पटना के गांधी मैदान के गेट नंबर-10 से वाम दलों और विभिन्न जनसंगठनों के कार्यकर्ताओं ने जन आक्रोश मार्च शुरू किया। मार्च राजभवन की ओर बढ़ रहा था। प्रदर्शन में भाकपा माले, AISF, AIYF, AISA सहित विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता शामिल बताए गए।
प्रदर्शनकारियों के हाथों में पोस्टर और झंडे थे। CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के अलावा प्रदर्शन में SIR, किसानों की जमीन, बेरोजगारी, बाढ़-सूखा और अन्य जन मुद्दों को भी उठाया गया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने समान नागरिक संहिता (UCC) के विरोध में भी नारे लगाए।
जेपी गोलंबर पर बढ़ा तनाव
मार्च के जेपी गोलंबर पहुंचने पर पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। रिपोर्टों के अनुसार कुछ प्रदर्शनकारी बैरिकेडिंग पर चढ़ गए और बाद में बैरिकेडिंग तोड़कर डाकबंगला चौराहे की ओर आगे बढ़ने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्कामुक्की हुई। मौके पर पुलिस बल तैनात रहा और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की गई।
वाम दलों की प्रमुख मांगें क्या हैं?
वाम दलों ने अपने संयुक्त बयान में मुख्य रूप से चार मांगें रखी हैं:
- CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जाए।
- SIR प्रक्रिया तत्काल रोकी जाए और जिन मतदाताओं को गलत तरीके से बाहर किया गया है, उनके मतदान अधिकार बहाल किए जाएं।
- चुनाव आयोग की स्वतंत्र और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली सुनिश्चित की जाए।
- चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव किया जाए। वाम दलों ने प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली तीन सदस्यीय चयन समिति का सुझाव दिया है।
14 आपत्तियों की रिपोर्ट से क्यों बढ़ा विवाद?
23 सितंबर को सामने आई एक रिपोर्ट में कहा गया कि दो चुनाव आयुक्तों ने करीब 10 महीने की अवधि में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में मतदाता सूची से नाम हटाने-बढ़ाने, Form 6 और चुनावी डेटा से जुड़े सिस्टम जैसे विषयों का उल्लेख किया गया।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और SIR को लेकर सवाल तेज कर दिए। कांग्रेस ने भी देशभर में प्रदर्शन किए। 25 सितंबर को पटना में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने पानी की बौछार का इस्तेमाल किया था।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट और उन आपत्तियों की राजनीतिक व्याख्या को एक ही बात नहीं माना जा सकता। चुनाव आयोग ने अपनी निर्णय प्रक्रिया को सामूहिक बताया है और रिपोर्ट से निकाले जा रहे राजनीतिक निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया है।
बिहार में पहले भी हो चुके हैं प्रदर्शन
पटना में 25 सितंबर को कांग्रेस के प्रदर्शन के दौरान भी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी थी। R-Block से चुनाव कार्यालय की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बैरिकेडिंग के जरिए रोका और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया।
इसके बाद 28 सितंबर को वाम दलों और विभिन्न जनसंगठनों का जन आक्रोश मार्च सामने आया। यानी बिहार में यह मुद्दा अब अलग-अलग विपक्षी दलों और संगठनों के प्रदर्शनों के जरिए लगातार सार्वजनिक बहस का विषय बना हुआ है।
30 सितंबर को विपक्षी दलों की बैठक
SIR और चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक विवाद अब अगले चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है। रिपोर्टों के अनुसार करीब 21 विपक्षी दलों के नेता 30 सितंबर को दिल्ली में बैठक कर आगे की संयुक्त रणनीति पर चर्चा कर सकते हैं। CEC के खिलाफ कार्रवाई, SIR और चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया जैसे मुद्दे बैठक में उठाए जाने की संभावना है।
इस बीच कांग्रेस ने 29 सितंबर को अपनी कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक बुलाने की घोषणा की है, जिसमें CEC और SIR से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होनी है।
चुनाव आयोग की मौजूदा संरचना
चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वर्तमान में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त, जबकि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त हैं। ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला था।
यही तीन सदस्यीय आयोग SIR और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों का केंद्र है। इसलिए दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को लेकर सामने आई रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस को बढ़ा दिया है। हालांकि, आयोग का आधिकारिक पक्ष यह है कि उसके फैसले सामूहिक और सर्वसम्मत प्रक्रिया से लिए गए हैं।
SIR क्या है और विवाद क्यों?
Special Intensive Revision यानी SIR मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना, पात्र मतदाताओं को शामिल करना और अपात्र या गलत प्रविष्टियों की पहचान करना है।
विवाद का मुख्य प्रश्न यह है कि इस प्रक्रिया में यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम सूची से बाहर हो जाता है तो उसे पर्याप्त अवसर और प्रक्रिया के जरिए अपना नाम दोबारा शामिल कराने की सुविधा कितनी प्रभावी तरीके से मिलती है। विपक्षी दलों का आरोप है कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग अपने पुनरीक्षण और सत्यापन तंत्र को चुनावी सूची की शुद्धता से जोड़ता है।
इसलिए वर्तमान विवाद का एक अहम हिस्सा मतदाता सूची की शुद्धता बनाम मताधिकार की सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल भी है।
पटना का प्रदर्शन सिर्फ एक राजनीतिक विरोध नहीं
पटना में हुआ जन आक्रोश मार्च ऐसे समय में हुआ है जब SIR और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में है। वाम दलों ने CEC को हटाने और SIR रोकने की मांग को अपने देशव्यापी आंदोलन का मुख्य मुद्दा बनाया है, जबकि चुनाव आयोग ने अपनी निर्णय प्रक्रिया को सामूहिक और सर्वसम्मत बताया है।
आगे इस विवाद की दिशा तीन महत्वपूर्ण घटनाओं से तय हो सकती है—SIR पर कानूनी और संस्थागत समीक्षा, चुनाव आयोग की ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण और 30 सितंबर की प्रस्तावित विपक्षी बैठक। राजनीतिक आरोपों से अलग वास्तविक महत्व इस बात का होगा कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, प्रभावित मतदाताओं के लिए शिकायत और अपील का तंत्र कितना प्रभावी है तथा चुनाव आयोग अपने फैसलों और प्रक्रियाओं से जुड़े सवालों का किस तरह सार्वजनिक जवाब देता है।
पटना में बैरिकेडिंग टूटने और पुलिस से धक्कामुक्की की घटना ने यह भी दिखाया है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े संस्थागत सवाल अब सड़क पर राजनीतिक आंदोलन का रूप ले चुके हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक गतिविधियां और कानूनी बहस दोनों बढ़ने की संभावना है।
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