डॉ. विएक ने बताया कि वैश्विक स्तर पर वर्तमान में ‘अस्वस्थ भू-रणनीतिक वातावरण’ के कारण जर्मनी और भारत दोनों ने अपनी सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए निवेश बढ़ाया है। दोनों देशों ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा क्षेत्र में कई द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें विमान, टैंक और समुद्री उपकरण शामिल हैं। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए सतह पनडुब्बी परियोजना को रणनीतिक महत्व दिया गया है।
पिछले वर्ष जर्मनी ने भारत को उच्च तकनीकी हथियार प्रणालियों की आपूर्ति की थी, जिसमें डोज़ी एरियल टॉरपीडो सिस्टम और इन्फैंट्री फायर सपोर्ट सिस्टम शामिल थे। भारत ने भी जर्मनी के साथ मिलकर सुसंगत रक्षा मानकों को अपनाने के लिए कई संयुक्त अभ्यास आयोजित किए हैं। इस सहयोग के तहत जर्मनी ने भारतीय नौसेना को अपने नवीनतम शिपिंग तकनीक और एंटी-सबमरीन वारफ़ाइटिंग क्षमताओं को साझा करने का प्रस्ताव रखा था।
अब दोनों देशों की सरकारें इस समझौते को औपचारिक रूप देने के लिए एक ‘फ़ॉरवर्ड लीनिंग’ मॉडल अपनाने की तैयारी में हैं, जिसका अर्थ है कि समझौते के शर्तों को भविष्य की तकनीकी उन्नति और रणनीतिक जरूरतों के अनुसार लचीला रखा जाएगा। इस मॉडल के तहत डिलीवरी शेड्यूल, मूल्य निर्धारण और तकनीकी सहायता के पहलुओं को समय-समय पर पुनरावलोकन किया जाएगा।
जर्मन प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि इस समझौते के तहत भारत को दो सतह पनडुब्बी प्रदान की जाएँगी, जिनमें उन्नत साइलेंट प्रोपल्शन और नवीनतम सेंसर पैकेज शामिल होंगे। दोनों पक्षों ने यह भी कहा कि निर्माण प्रक्रिया जर्मन शिपयार्ड में शुरू होगी, जबकि असेंबली और अंतिम परीक्षण भारत में किए जाएंगे। इस व्यवस्था से भारत को अपनी नौसैनिक क्षमताओं को तेज़ी से बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
भारतीय नौसेना के प्रमुख अधिकारी ने इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया जताई और कहा कि सतह पनडुब्बी भारतीय समुद्री सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह सहयोग भारत के ‘मेक इन इंडिया’ पहल के साथ मेल खाता है, जहाँ विदेशी तकनीक को स्थानीय स्तर पर विकसित किया जाएगा।
जर्मन दूतावास ने यह स्पष्ट किया कि समझौते की अंतिम रूपरेखा पर चर्चा अभी भी जारी है, और दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों को तकनीकी विनिर्देश, लागत संरचना और समयसीमा पर अंतिम सहमति बनानी होगी। इस प्रक्रिया में जर्मन कंपनी थॉल और भारतीय औद्योगिक समूहों के बीच भी वार्ता चल रही है।
भारत के विदेश मंत्री ने इस कदम को ‘समुचित समय पर उचित कदम’ बताया और कहा कि यह सहयोग दोनों देशों के रणनीतिक साझेदारी को और सुदृढ़ करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को बहुस्तरीय बनाते हुए विविध सहयोगियों के साथ काम कर रहा है।
जर्मन रक्षा मंत्री ने कहा कि यह समझौता जर्मनी के ‘ऑफ़रिंग्स फॉर ग्लोबल पार्टनर्स’ पहल का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य यूरोपीय देशों को विश्व स्तर पर विश्वसनीय रक्षा साझेदार बनाना है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस समझौते से जर्मन शिपबिल्डिंग उद्योग को नई आय प्राप्त होगी।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इस समझौते से दोनों देशों के बीच रक्षा निर्यात-आयात में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। जर्मनी को भारत के विशाल रक्षा बजट से लाभ होगा, जबकि भारत को उन्नत तकनीक सस्ती दर पर प्राप्त होगी। इस प्रकार दोनो पक्षों के लिए आर्थिक लाभ स्पष्ट है।
सामाजिक दृष्टिकोण से, इस साझेदारी से नौसैनिक कर्मियों के प्रशिक्षण और तकनीकी कौशल में वृद्धि होगी। भारतीय नौसेना को जर्मन विशेषज्ञों के साथ संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अवसर मिलेगा, जिससे सशस्त्र बलों की दक्षता बढ़ेगी।
राजनीतिक रूप से, यह समझौता भारत और
Updated: September 23, 2026
By swapping advanced surface‑submarine tech for on‑site Indian assembly, Germany turns a classic export deal into a partnership that fuels India’s self‑reliance while keeping German shipyards busy—essentially a win‑win that re‑aligns two rival markets under a “future‑