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सुप्रीम कोर्ट में वकीलों के धरने पर पुलिस ने कई अधिवक्ताओं को हिरासत में लिया, मुख्य न्यायाधीश ने समीक्षा का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट के पास प्रकट हुए वकीलों के विरोध को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने कई अधिवक्ताओं को हिरासत में ले लिया, यह बात ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन (AALU) के प्रदेश प्रमुख संजय कुमार ने कहा। इस कदम को लेकर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने गंभीर चिंता जताई और तत्काल रिहाई का आग्रह किया। इस घटना पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने हस्तक्षेप कर मामले की समीक्षा का आदेश दिया, जिससे कानूनी समुदाय में तेज़ी से चर्चा छा गई है।

वकीलों का विरोध सुप्रीम कोर्ट के बाहर दो दिन पहले शुरू हुआ था, जब उन्होंने न्यायालय की कार्यवाही में देरी और कई केसों में लंबित रहने की समस्या को उजागर किया। इस दौरान उन्होंने कोर्ट के मुख्य द्वार के पास धरना दिया और कई माँगें रखी, जिनमें न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ करने, वकीलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और कोर्ट की कार्यशैली में पारदर्शिता लाने की मांग शामिल थी।

अधिवक्ता संघ के अनुसार, पुलिस ने इस धरने को अवैध घोषित कर कई वकीलों को बिना वारंट के गिरफ्तार किया। गिरफ्तारियों में वरिष्ठ वकीलों सहित कई युवा वकील शामिल हैं, जिनमें कुछ ने पहले ही कोर्ट के बाहर अपनी रिहाई का आग्रह किया था। इस कार्रवाई को कई बार पुलिस द्वारा “अवरोधन” और “सामाजिक शांति” के कारण बताया गया, परन्तु वकीलों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में आलोचना की।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने तुरंत एक विशेष बैठक बुलाई और सभी सदस्यों को एकजुट होने का आह्वान किया। SCBA के अध्यक्ष ने बताया कि यह कदम न्यायिक प्रणाली की स्वायत्तता को धूमिल करने की कोशिश है और उन्होंने पुलिस को तत्काल सभी वकीलों को रिहा करने का निर्देश दिया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि न्यायालय को इस प्रकार की हिंसा का सामना करना पड़े तो न्याय के सिद्धांत कमजोर हो सकते हैं।

पुलिस ने कहा कि वे कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं और धरने को “अनधिकृत सभा” मानते हुए कार्रवाई की। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी व्यक्ति यदि सार्वजनिक स्थान पर बाधा उत्पन्न करता है, तो उसे रोकना पुलिस की जिम्मेदारी है। पुलिस ने आरोप लगाया कि वकीलों ने अदालत की कार्यवाही में बाधा डालने का इरादा रखा था, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हुआ।

संजय कुमार ने बताया कि कई वकीलों को रात में ही जेल में ले जाया गया और उन्हें उचित कानूनी सहायता नहीं मिली। उन्होंने यह भी कहा कि वकीलों के परिवारों को भी इस कार्रवाई से अनावश्यक तनाव झेलना पड़ रहा है। AALU ने इस मुद्दे को लेकर एक राष्ट्रीय स्तर पर जन जागरूकता अभियान शुरू करने की घोषणा की है, ताकि न्यायपालिका में सुधार की मांगें अधिक प्रभावी बन सकें।

मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले पर व्यक्तिगत तौर पर टिप्पणी की और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के सामने किसी भी प्रकार का दबाव या हस्तक्षेप अस्वीकार्य है। उन्होंने सभी पक्षों को शांत रहने का निर्देश दिया और कहा कि कोर्ट का कार्यशैली और न्यायिक स्वतंत्रता को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस को भी उचित प्रक्रिया अपनाने और अनावश्यक हिरासत से बचने का आदेश दिया।

राजनीतिक वर्ग से भी इस मामले पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। कुछ दलों ने पुलिस की कार्रवाई की निंदा की और कहा कि यह न्यायिक प्रणाली पर भरोसे को कमजोर कर रहा है। वहीं कुछ ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई जरूरी थी। विपक्षी पार्टी के नेता ने इस घटना को “सत्ता का दमन” कहा और न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाने की मांग की।

आर्थिक पक्ष से देखें तो वकीलों की हिरासत से न्यायिक प्रक्रिया में देरी और लागत में वृद्धि की आशंका है। कई मामलों में वकीलों की अनुपस्थिति के कारण कोर्ट की सुनवाई स्थगित हो सकती है, जिससे क्लाइंट्स को आर्थिक नुकसान हो सकता है। वाणिज्यिक मामलों में इस प्रकार की देरी का असर बाजार की स्थिरता पर भी पड़ सकता है, विशेषकर जब बड़े निवेश और अनुबंधों का निपटारा लंबित हो।

सामाजिक रूप से इस घटना ने न्यायपालिका में भरोसे को लेकर व्यापक चर्चा छेड़ दी है। कई नागरिक समूहों ने इस पर विरोध प्रदर्शन किया और न्यायिक सुरक्षा के

Updated: October 10, 2026


Delhi police detained several lawyers protesting outside the Supreme Court, prompting the SCBA to demand their immediate release and drawing intervention from the Chief Justice. The arrests have sparked a nationwide debate over judicial independence, procedural fairness and the impact on court functioning.

The arrests signal a dangerous drift toward policing dissent within the legal elite, threatening the judiciary’s self‑governance and eroding public confidence in rule of law.
If unchecked, such coercion could cascade into longer case backlogs and higher litigation costs, turning a professional protest into a systemic economic liability.

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