अनदेखा करने का आरोप लगाया गया है। कोर्ट ने पहले 9 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और ट्रेनों को रद्द करने के आदेश को सवाल के घेरे में ले लिया था, यह दर्शाते हुए कि सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक परिवहन को पूर्ण रूप से बंद नहीं किया जा सकता।
पिछले कुछ हफ़्तों में दिल्ली में CJP द्वारा आयोजित विभिन्न विरोध प्रदर्शनों ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया था। जंतर-मंत्र में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन की योजना के साथ कई विरोधी समूहों ने एकजुट होने की घोषणा की, जिससे स्थानीय प्रशासन को भीड़ प्रबंधन के लिए अतिरिक्त उपाय करने पड़े। इस
बीच, मेट्रो और बस सेवाओं को रोकने के लिए प्रशासनिक आदेश जारी किए गए, जिससे नागरिकों में असुविधा और आर्थिक नुकसान की चिंता बढ़ी।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को जारी आदेश में कहा था कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिये आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं, परन्तु उन्हें कानून-व्यवस्था और नागरिक अधिकारों
के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। कोर्ट ने इस बात पर बल दिया कि सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद करना अनुपातहीन होगा और इससे आम जनता पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि ऐसी प्रतिबंधात्मक कार्रवाई को केवल आपातकालीन परिस्थितियों में ही लागू
किया जा सकता है।
विचाराधीन याचिका में CJP के विरोधी वकील ने कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश की जानबूझकर अनदेखी का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि CJP के समर्थक, जो जंतर-मंत्र में प्रदर्शन करने वाले थे, ने पहले ही मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के आदेश को नज़रअंदाज़ कर दिया, जिससे
बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई और सुरक्षा जोखिम बढ़ा। याचिका में यह भी कहा गया कि इस अनदेखी से न केवल सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ी, बल्कि कई नागरिकों को अपने कार्यस्थल और घर पहुंचने में कठिनाई हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक परिवहन का बंद होना केवल तभी वैध
है जब यह सुरक्षा कारणों से अत्यावश्यक हो। कोर्ट ने कहा कि प्रशासन को वैकल्पिक उपाय, जैसे अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती और विशेष नियंत्रण बिंदुओं की स्थापना, को प्राथमिकता देनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी भी प्रतिबंध को लागू करने से पहले सार्वजनिक हित, आर्थिक प्रभाव और नागरिक अधिकारों
का व्यापक मूल्यांकन आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मेट्रो प्रशासन को भी संबोधित किया, जिसमें उन्होंने बताया कि मेट्रो संचालन को रोकने के लिए पूर्व सूचना और वैकल्पिक मार्ग प्रदान करना अनिवार्य है। प्रशासन ने बताया कि उन्होंने सुरक्षा बलों को तैनात कर संभावित अव्यवस्था को नियंत्रित करने की कोशिश
की, परन्तु सार्वजनिक प्रतिक्रिया अत्यधिक थी। मेट्रो अधिकारियों ने कहा कि वे कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन करेंगे और भविष्य में ऐसी स्थितियों में अधिक पारदर्शिता रखेंगे।
CJP के समर्थन समूह ने अदालत के फैसले पर अपनी निराशा जताई, यह कहते हुए कि सुरक्षा उपायों को लेकर प्रशासन की लापरवाही
ने प्रदर्शनकर्ताओं को असहाय बना दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने भीड़ नियंत्रण के लिए स्वयं स्वयंसेवकों की व्यवस्था की थी, परन्तु प्रशासनिक आदेशों में बदलाव ने उनकी तैयारी को बर्बाद कर दिया। समूह के मुख्य प्रवक्ता ने यह भी कहा कि वे न्यायालय के आदेश का सम्मान करेंगे, परन्तु भविष्य में किसी भी
प्रतिबंध से पहले संवाद को प्राथमिकता देंगे।
दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियों ने कहा कि उन्होंने प्रदर्शन की सुरक्षा के लिये व्यापक योजना बनाई थी, जिसमें एंटी-टेरर टास्क फोर्स और स्थानीय पुलिस शामिल थे। उन्होंने बताया कि मेट्रो स्टेशनों को बंद करने का निर्णय तत्काल खतरे को रोकने के लिये लिया गया था,
क्योंकि जानकारी में आया था कि कुछ अज्ञात समूह प्रदर्शन के दौरान हिंसा का उपयोग कर सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने यह भी कहा कि उन्होंने सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद करने के बजाय वैकल्पिक सुरक्षा उपायों पर विचार किया था, परन्तु समय की कमी ने उन्हें यह कदम उठाने पर मजबूर
किया।
राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि इस मामले में न्यायालय का कदम प्रशासनिक अधिकारों और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन को बंद करने का निर्णय न केवल आर्थिक क्षति का कारण बना
Supreme Court set a special hearing on Oct 11 to examine whether Delhi’s shutdown of metro and bus services for Central Justice Process protests was a proportionate security measure, stressing that full closures are permissible only in genuine emergencies. The bench warned authorities to weigh public safety against economic disruption and civil liberties, urging less‑drastic alternatives such as extra security personnel and advance notice.
Delhi’s courts are drawing a line that security‑driven shutdowns can’t become a routine tool, forcing protest planners to treat civic logistics as a bargaining chip rather than a casualty.
This push for proportionality signals a broader shift: authorities will have to embed transparent, low‑impact safeguards into dissent‑management, or risk
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