ने बताया कि यह प्रणाली विशेष रूप से ड्रोन के माध्यम से की जाने वाली तस्करी और अवैध प्रवेश को रोकने के लिए डिज़ाइन की गई है। प्रारम्भिक परीक्षण परियोजना पाकिस्तान की सीमा पर शीघ्र ही शुरू की जाएगी, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा का नया आयाम स्थापित होगा।
पिछले दो दशकों में भारत की सीमा पर अवैध पारगमन, तस्करी और असंगठित आपराधिक गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। विशेष रूप से ड्रोन का प्रयोग करके धातु, ड्रग्स और दुर्लभ पशु उत्पादों को पार करना सामान्य हो गया है, जिससे परंपरागत निगरानी विधियां अपर्याप्त साबित हुई
हैं। मौजूदा सीमा निगरानी प्रणाली में कई बिंदु पर कवरेज की कमी और डेटा के विलंबित प्रसंस्करण की समस्याएं थीं, जिससे त्वरित निर्णय लेने में बाधा उत्पन्न होती थी। इन चुनौतियों को मद्देनज़र रखते हुए, सरकार ने तकनीकी उन्नयन को प्राथमिकता दी है।
केंद्रीय सरकार ने 2022
में ‘डिजिटल भारत’ कार्यक्रम के अंतर्गत सीमा सुरक्षा में तकनीकी एकीकरण के लिए एक विशेष कार्य समूह गठित किया था। इस समूह ने विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मानकों और भारत की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों को मिलाकर एक विस्तृत रूपरेखा तैयार की। रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना में एआई‑सक्षम एल्गोरिदम के
माध्यम से वास्तविक‑समय में अनियमित उड़ान पैटर्न की पहचान, थ्रेट लेवल के अनुसार अलर्ट जनरेशन और स्वचालित संसाधन तैनाती शामिल है। इस प्रणाली के निर्माण में राष्ट्रीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास निगम (DRDO) और भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय दोनों का सहयोग होगा।
एकीकृत कमांड सेंटर की मूल
संरचना तीन स्तरीय स्तरों पर कार्य करेगी। प्रथम स्तर में सीमा के विभिन्न बिंदुओं पर स्थापित सेंसर नेटवर्क, रडार और कैमरे डेटा एकत्र करेंगे। द्वितीय स्तर में एआई‑आधारित विश्लेषण मंच इन डेटा को प्रोसेस कर संभावित खतरे की पहचान करेगा। तृतीय स्तर में राष्ट्रीय कमांड‑एंड‑कंट्रोल हब स्थित होगा,
जहाँ सीनियर अधिकारी तत्काल निर्णय लेकर बलों को निर्देशित करेंगे। इस मॉडल का लक्ष्य मानवीय त्रुटियों को न्यूनतम कर तेज़ और सटीक कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
पायलट प्रोजेक्ट के लिए पाकिस्तान की सीमा पर स्थित 150 किमी के खंड को चुना गया है। इस क्षेत्र में पहले
से ही कई ड्रोन‑आधारित तस्करी के मामले दर्ज हैं, जिससे यह परीक्षण स्थल उपयुक्त माना गया। पायलट चरण में 30 एआई‑सक्षम कैमरे, दो रडार स्टेशन और एक मोबाइल कमांड यूनिट स्थापित की जाएगी। यह इकाई 24×7 निगरानी करेगा और किसी भी असामान्य गतिविधि की सूचना तुरंत केंद्रीय नियंत्रण
केंद्र को भेजेगा। पायलट के परिणामों के आधार पर प्रणाली को अन्य सीमा क्षेत्रों में विस्तारित किया जाएगा।
केंद्र के प्रमुख अधिकारी ने इस घोषणा के दौरान बताया कि एकीकृत कमांड सेंटर न केवल सुरक्षा बल्कि आर्थिक लाभ भी देगा। तस्करी में कमी से आयातित वस्तुओं पर
लागू कस्टम ड्यूटी और टैक्स राजस्व में वृद्धि की उम्मीद है। साथ ही, ड्रोन के दुरुपयोग को रोकने से विमानन क्षेत्र में सुरक्षा मानकों का भी उन्नयन होगा। इस पहल के अंतर्गत स्थानीय सुरक्षा कर्मियों को नई तकनीकों के संचालन में प्रशिक्षित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम
आयोजित किए जाएंगे।
इस नई योजना पर विपक्षी दल ने सुरक्षा खर्च की बढ़ोतरी को लेकर सवाल उठाए हैं। वे तर्क देते हैं कि सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी बुनियादी ढांचा और मानव संसाधन की कमी है, जो तकनीकी निवेश को प्रभावी नहीं बना सकता। इसके अलावा, कुछ
राजनेताओं ने कहा कि इस तरह की एआई‑आधारित प्रणाली में व्यक्तिगत गोपनीयता और डेटा सुरक्षा के मुद्दे भी गंभीर हो सकते हैं। हालांकि, सरकार ने कहा कि सभी डेटा को एन्क्रिप्टेड रूप में संग्रहित किया जाएगा और केवल अधिकृत अधिकारियों को ही पहुंच होगी।
सीमा सुरक्षा के
विशेषज्ञों ने कहा कि एआई और सेंसर तकनीक का उपयोग निश्चित रूप से निगरानी क्षमता को बढ़ाएगा, परंतु इसे प्रभावी बनाने के लिए सतत रखरखाव और सॉफ्टवेयर अपडेट आवश्यक हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग, विशेषकर
India’s new “Smart Border” project will deploy AI‑driven sensors, cameras and an integrated command centre to curb drone‑enabled smuggling, with a pilot rollout along a 150‑km stretch of the Pakistan frontier. Officials say the system will speed up threat detection, boost customs revenue and set a modern security benchmark, while opposition raises cost and privacy concerns.
By embedding AI‑driven surveillance at the border, India is turning a chronic smuggling problem into a data‑rich revenue stream, forcing illicit actors to confront a near‑real‑time cost for every drone flight.
If the pilot proves reliable, the “smart border” could become a template
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