आईआईटी बॉम्बे के इतिहास में कई बार शैक्षणिक उत्कृष्टता और नवाचार को सराहा गया है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों में संस्थान में अनुशासनात्मक नीतियों में बदलाव देखा गया है। 2020 में शुरू हुई ‘सुरक्षा प्रोटोकॉल’ पहल के तहत परिसर में गेट्स को सख्ती से नियंत्रित किया गया, और छात्रों की आवाज़ को सुनने वाले मंचों को सीमित किया गया। इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के साथ सहयोग को बताया गया, परंतु इसके प्रभाव पर व्यापक चर्चा नहीं हुई।
पिछले वर्ष, बेंगलुरु में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान भी आईआईटी बॉम्बे के छात्रों को कड़ाई से ड्रेस कोड और व्यवहार नियमों का पालन करने के लिए कहा गया था, जिससे कई छात्रों ने विरोध जताया था। इस घटना को संस्थान के भीतर ‘सैन्यीकरण’ के शुरुआती संकेत के रूप में देखा गया। इसके बाद, कई छात्र समूहों ने सामाजिक मीडिया पर अपने असंतोष को व्यक्त किया, परन्तु प्रशासन ने इस पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी।
इस साल के फरवरी में पहली छात्र मृत्यु हुई, जब एक प्रथम वर्ष के छात्र को कैंपस के भीतर एक सुरक्षा कर्मी द्वारा अनुशासनात्मक कारण से फेंके गए बाड़ में गिरते समय चोट आई। अस्पताल में उपचार के बाद भी छात्र की हालत बिगड़ती रही और वह दो सप्ताह बाद ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। यह घटना तुरंत छात्रों में घबराहट और गुस्से का कारण बनी, और कई ने इस घटना को ‘अधिकतम बल प्रयोग’ के रूप में लेबल किया।
तीसरे महीने में एक दूसरे प्रथम वर्ष के छात्र का भी वही भाग्य लिखा गया। इस बार छात्र को परीक्षा के दौरान ‘कठोर नियमों’ के उल्लंघन के कारण कक्षा से बाहर निकाल दिया गया, और बाहर निकलते समय उसे सुरक्षा गार्ड द्वारा धक्का दिया गया। गिरते समय उसकी रीढ़ में गंभीर चोट लगी, और वह तुरंत ही अस्पताल ले जाया गया। मेडिकल रिपोर्ट ने बताया कि यदि तुरंत उचित देखभाल नहीं की जाती तो यह घातक हो सकता था।
अगले महीने, एक वरिष्ठ छात्र ने स्वयं-हत्याकांड किया, जिससे यह सवाल उठे कि क्या कैंपस में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है। इस छात्र ने अपनी अंतिम नोट में संस्थान के ‘सैन्यीकरण’ और ‘कठोर अनुशासन’ को अपने आत्महत्या के कारण के रूप में बताया। इस घटना ने छात्रों के बीच मनोवैज्ञानिक सहायता की मांग को तीव्र कर दिया।
इन घटनाओं पर आईआईटी बॉम्बे के प्रशासन ने एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि संस्थान हमेशा छात्रों की सुरक्षा को प्रथम प्राथमिकता देता है और सभी मामलों की स्वतंत्र जांच की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा कर्मियों को उचित प्रशिक्षण दिया गया है और किसी भी अनुचित व्यवहार की तुरंत रिपोर्ट की जाएगी। प्रशासन ने कहा कि कैंपस में तनाव कम करने के लिए काउंसलिंग सेवाओं को बढ़ाया जाएगा।
इसी बीच, छात्र संघों ने एक सामूहिक प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने सुरक्षा कर्मियों की कार्यवाही के मानक को पुनः विचार करने और छात्रों की आवाज़ को सुनने की मांग की। उन्होंने बताया कि कई बार छात्रों को बिना उचित कारण के ड्यूटी में डाला जाता है और उन्हें ‘सैन्यीकरण’ के कारण शारीरिक व मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है।
विदेशी सहयोगी संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि एक उच्च शिक्षण संस्थान के रूप में आईआईटी बॉम्बे को अपने छात्रों की शैक्षणिक स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना चाहिए। उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि अत्यधिक सुरक्षा उपायों से संस्थान की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर असर पड़ सकता है।
राज्य सरकार की शिक्षा विभाग ने इस मामले में हस्तक्षेप कर, संस्थान को निर्देश दिया कि वह एक स्वतंत्र जांच समिति स्थापित करे, जिसमें बाहरी विशेषज्ञ और मानवाधिकार प्रतिनिधि शामिल हों। विभाग ने कहा कि यदि किसी भी प्रकार की लापरवाही पाई जाती है तो सख्त अनुशासनात्मक
Updated: September 27, 2026
Summary: Former IIT Bombay students allege that heightened security measures have led to two fatal incidents this year and a spate of student deaths, prompting calls for a transparent probe. The institute faces mounting pressure to curb “militarisation” of campus life and improve mental‑health support while balancing safety and academic freedom.
The surge of “militarized” discipline at IIT Bombay isn’t just a safety tweak—it’s breeding a climate of fear that erodes trust and mental‑health resilience among its brightest minds. Until the institute re‑balances control with genuine student welfare, the prestige it touts risks