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हैदराबाद में कृष्ण कथा की डिजिटल प्रस्तुति, प्रोजेक्शन‑मैपिंग व एआर से पारम्परिक नाट्य में नया तकनीकी आयाम।

हैदराबाद में आयोजित राजाधिराज यात्रा के मंच पर कृष्ण कथा को नया रूप देकर प्रस्तुत किया गया, जहाँ प्राचीन नाट्यशैलियों और अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों का संयोजन देखने को मिला। इस कार्यक्रम ने पारम्परिक पौराणिक थियेटर में डिजिटल स्क्रीन, प्रोजेक्शन मैपिंग और ऑगमेंटेड रियलिटी (एआर) जैसी तकनीकों के प्रयोग को प्रमुखता से

उजागर किया, जिससे दर्शकों को न केवल कथा का भावात्मक अनुभव मिला बल्कि दृश्यात्मक रूप से भी अद्यतित प्रस्तुति देखी गई। इस पहल का उद्देश्य शास्त्रीय नाटकों को युवा वर्ग तक पहुँचाना और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक मंच पर जीवंत बनाना बताया गया।

पिछले दो दशकों में भारत में पौराणिक

नाट्य परम्परा में धीरे‑धीरे बदलाव आया, परंतु तकनीकी एकीकरण अभी तक सीमित रहा था। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर भारत के कई मंचों ने लाइटिंग और ध्वनि को सुदृढ़ करने के लिए साधारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अपनाए, परन्तु हैदराबाद की इस प्रस्तुति में 4 K प्रोजेक्शन, इंटरैक्टिव LED फर्श और वर्चुअल बैकड्रॉप का उपयोग

किया गया, जिससे मंच पर वास्तविकता की सीमा विस्तारित हुई। इस प्रवृत्ति का मूल कारण शहरी दर्शकों की तकनीकी समझ और अपेक्षाओं में परिवर्तन माना जा रहा है।

राजाधिराज यात्रा का मंचन, जिसे राष्ट्रीय कला परिषद (एनसीए) ने वित्तीय सहयोग प्रदान किया, यह दर्शाता है कि सार्वजनिक निधि अब केवल

पारम्परिक कला ही नहीं, बल्कि तकनीकी‑आधारित नवाचार को भी समर्थन दे रही है। इस परियोजना में स्थानीय विश्वविद्यालयों के इलेक्ट्रॉनिक्स और मल्टीमीडिया विभागों के छात्रों को इंटर्न के रूप में शामिल किया गया, जिससे शैक्षणिक संस्थानों और सांस्कृतिक उद्योग के बीच सहयोग को बढ़ावा मिला। इस सहयोगी मॉडल ने नाट्यशास्त्र में

अनुसंधान‑आधारित नवाचार को भी प्रोत्साहित किया।

कार्यक्रम के प्रमुख क्षणों में से एक था कृष्ण के बाल लिलाओं का दृश्य, जहाँ प्रोजेक्शन मैपिंग के माध्यम से जलधारा, वृक्ष और वन्यजीवन को वास्तविक समय में बदलते रंगों और गति के साथ प्रस्तुत किया गया। इस दृश्य में ध्वनि प्रणाली ने बांसुरी

की ध्वनि को 3‑डी साउंड के रूप में वितरित किया, जिससे दर्शकों को गहरी इमर्सिव अनुभव मिला। इसके अलावा, मंच के मध्य में स्थापित इंटरेक्टिव LED फर्श ने कलाकारों के कदमों के साथ रंग बदलते हुए कथा के भाव को सुदृढ़ किया, जिससे दर्शकों में कथा‑संबंधी भावनात्मक जुड़ाव बढ़ा।

तकनीकी

टीम ने कहा कि इस प्रकार के जटिल सेट‑अप को सफल बनाने के लिए कई महीने की पूर्व योजना, सिमुलेशन और परीक्षण आवश्यक थे। उन्होंने बताया कि प्रोजेक्शन के लिए उपयोग किए गए सॉफ़्टवेयर को कथा के अनुसार कस्टमाइज़ किया गया, जिससे प्रत्येक दृश्य में ऐतिहासिक पौराणिक विवरण को सटीक रूप

से दर्शाया जा सके। इसके साथ ही, एआर एप्लिकेशन को दर्शकों के स्मार्टफोन से सिंक्रोनाइज़ किया गया, जिससे वे स्क्रीन पर अतिरिक्त जानकारी और इंटरैक्टिव क्विज़ का आनंद ले सके।

कार्यक्रम के बाद, प्रमुख नाट्यकार और प्रोडक्शन हाउस के प्रतिनिधियों ने इस तकनीकी‑आधारित प्रस्तुति की सराहना की। उन्होंने कहा कि

तकनीक ने कथा को न केवल दृश्यात्मक रूप से समृद्ध किया, बल्कि कलाकारों को नई अभिव्यक्ति के साधन भी प्रदान किए। परम्परागत कलाकारों ने भी स्वीकार किया कि तकनीक के प्रयोग से उनकी प्रदर्शन कौशल में नयी संभावनाएँ खुल रही हैं, जबकि उन्हें अपने मौलिक अभिव्यक्ति को बनाए रखने की चुनौती

भी मिल रही है।

राज्य सरकार के सांस्कृतिक विभाग के प्रमुख ने कहा कि इस प्रकार के नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए आगे भी विशेष अनुदान और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएंगे। उन्होंने उल्लेख किया कि तकनीकी सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा, जिससे छोटे‑स्तर के

थियेटर ग्रुप भी उन्नत उपकरणों का उपयोग कर सकें। इस पहल से न केवल स्थानीय कलाकारों को लाभ होगा, बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था में भी वृद्धि की आशा है।

कृष्ण कथा की इस डिजिटल पुनःप्रस्तुति ने सामाजिक स्तर पर कई प्रश्न उठाए। कुछ सांस्कृतिक समूहों ने कहा कि अत्यधिक

तकनीकी प्रयोग से पौराणिक कथा के मूल भाव से विमुखता हो सकती है, जबकि युवा वर्ग ने इसे नवीनता और आकर्षण के रूप में स्वीकार किया। इस बीच, सामाजिक मीडिया पर इस कार्यक्रम की व्यापक चर्चा ने दर्शकों के विविध प्रतिक्रियाओं को उजागर किया, जिसमें प्रशंसा, आलोचना और सुझाव सभी शामिल

थे।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो, इस प्रकार के हाई‑टेक नाटकों में निवेश लागत परंपरागत मंच प्रस्तुतियों से कई गुना अधिक है। हालांकि, टिकट बिक्री, प्रायोजन और ब्रांड सहयोग से उत्पन्न राजस्व ने इस अंतर को घटाने में मदद की। उद्योग विशेषज्ञों का

The Hyderabad showcase proves that high‑tech staging isn’t a gimmick but a cultural bridge—digital immersion rewrites myth for a tech‑savvy generation while forcing traditional artists to reinvent their craft.

If public funds keep subsidizing such hybrid productions, we’ll likely see a new economy where heritage tourism and

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