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डॉ. ए.आर. कॉलेज में 500+ छात्राओं ने यौन उत्पीड़न विरोध में सुरक्षा, तेज़ शिकायत सेल और बेहतर प्रकाश व्यवस्था की माँग की।

डॉ. ए.आर. कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में दो दिन पहले आयोजित एक महिला‑केवल मार्च में पाँच सौ से अधिक छात्रा‑छात्रों ने शारीरिक हिंसा के ख़िलाफ़ सख्त कदमों की मांग की, जिसमें कार्यक्षम आंतरिक शिकायत सेल, बेहतर सड़क प्रकाश और यौन उत्पीड़न के मामलों में तेज़ एवं पारदर्शी जवाबदेही शामिल है। इस प्रदर्शन में छात्रों ने

एकत्रित हस्ताक्षर और मौखिक प्रस्तावों के माध्यम से विश्वविद्यालय प्रशासन को तत्काल सुधारात्मक उपाय लागू करने का आह्वान किया, जिससे शैक्षणिक संस्थानों में सुरक्षा की स्थिति पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का माहौल तैयार हुआ।

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) का इतिहास भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक बदलाव के अग्रदूत के रूप में जाना जाता है, परन्तु

पिछले कुछ वर्षों में यौन उत्पीड़न के कई मामलों की रिपोर्टें सार्वजनिक हुई हैं। 2018 में राष्ट्रीय स्तर पर ‘व्यवस्थापकीय यौन उत्पीड़न निवारण नीति’ (आर्टिकल 9) के लागू होने के बावजूद, कई विश्वविद्यालयों में शिकायत प्रक्रिया धीमी और असंगत रही है। इसी संदर्भ में, पिछले साल ही DU के दो प्रमुख कॉलेजों में छात्राओं द्वारा कई

बार असंतोष प्रकट किया गया था, जिससे इस मार्च का सामाजिक एवं ऐतिहासिक महत्व स्पष्ट हुआ।

उसी वर्ष के अंत में, विश्वविद्यालय ने ‘विनीत प्रक्रिया’ के नाम से एक आंतरिक शिकायत यंत्र स्थापित किया, परन्तु छात्रों ने इसे अपर्याप्त बताया। उन्होंने बताया कि शिकायत दर्ज करने के बाद अक्सर जवाब में देरी और अस्पष्टता देखी गई, जिससे

पीड़ितों को न्याय तक पहुंचने में अतिरिक्त कठिनाई हुई। इस बीच, राष्ट्रीय स्तर पर ‘कुशली’ नामक एक NGO ने भी DU में सुरक्षा उपायों की कमी की ओर इशारा किया, जिसके कारण छात्रों का निराशा स्तर बढ़ा। इन सब कारकों ने मार्च को प्रेरित किया, जिसमें सुरक्षा के मूलभूत बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की माँगें

प्रमुख रही।

मार्च के दौरान, छात्रों ने दो प्रमुख मांगें रखी: पहला, सभी कॉलेजों में कार्यशील आंतरिक शिकायत सेल की स्थापना, जिसमें त्वरित जांच, गोपनीयता एवं पीड़ित के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित हो; दूसरा, कैंपस के प्रमुख क्षेत्रों में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था और सीसीटीवी कैमरों की तैनाती, जिससे अपराध रोकथाम में सहायता मिल सके। इस मंच से

छात्रों ने यह भी कहा कि मौजूदा शिकायत प्रक्रिया में उत्तरदायित्व की कमी से उत्पीड़न के मामलों में पुनरावृत्ति होती है, और इसे सुधारने के लिए एक स्वतंत्र निगरानी समिति की आवश्यकता है।

इन मांगों के साथ, कई छात्राओं ने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए, जिसमें उन्होंने बताया कि कई बार उत्पीड़न की रिपोर्ट करने के बाद भी

उचित कार्रवाई नहीं हुई। कुछ ने यह भी कहा कि शिकायत करने के बाद उन्हें सामाजिक दबाव और स्टिग्मा का सामना करना पड़ा, जिससे कई पीड़ित चुपचाप रहना पसंद करते हैं। इस प्रकार, छात्रों ने न केवल संस्थागत सुधार की मांग की, बल्कि सामाजिक मान्यताओं में बदलाव की भी पुकार की, जिससे पीड़ितों को आवाज़ मिल

सके।

इसी क्रम में, विश्वविद्यालय के प्रबंधन ने इस मार्च को सराहा और बताया कि वे छात्रों की चिंताओं को समझते हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा शिकायत यंत्र को पुनः समीक्षा करने और आवश्यक संसाधन प्रदान करने की प्रक्रिया में हैं। इसके साथ ही, उन्होंने कहा कि नई सुरक्षा नीतियों को लागू करने में 30 दिनों का

समय दिया जाएगा, जिसमें प्रकाश व्यवस्था और निगरानी उपकरणों की व्यवस्था शामिल है। प्रशासन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वे सभी छात्रों के लिए सुरक्षित और सहायक वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

पर्यवेक्षक और राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत NGOs ने इस प्रदर्शन को सकारात्मक रूप से देखा। राष्ट्रीय महिला आयोग के प्रवक्ता ने कहा

कि DU में इस प्रकार की सार्वजनिक वकालत आवश्यक है और यह अन्य शैक्षणिक संस्थानों को भी प्रेरित कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को यौन उत्पीड़न के मामलों में तेज़ जवाबदेही और प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए नीतियों को सुदृढ़ करना चाहिए। इसी बीच, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भी

इस मुद्दे पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए, कुछ ने विश्वविद्यालय को अधिक सख्त नियम लागू करने का आग्रह किया।

विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने इस अवसर का उपयोग करके सरकार की मौजूदा नीतियों की आलोचना की, यह दर्शाते हुए कि कई विश्वविद्यालयों में यौन उत्पीड़न की समस्या अभी भी अनसुलझी है। उन्होंने कहा कि केवल संस्थागत सुधार

पर्याप्त नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और शिक्षा में बदलाव लाना भी अनिवार्य है। वहीं, कुछ राजनैतिक विश्लेषकों ने इस घटना को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में रखा, यह तर्क देते हुए कि शिक्षा संस्थानों में सुरक्षित माहौल न हो तो युवा वर्ग का समग्र विकास प्रभावित हो सकता है।

आर्थिक दृष्टिकोण से इस आंदोलन का प्रभाव

स्पष्ट है। सुरक्षा में सुधार के लिए विश्वविद्यालय को अतिरिक्त बजट आवंटन करना पड़ेगा, जिससे अन्य विकासात्मक योजनाओं पर दबाव पड़ सकता है। साथ ही, यदि संस्थागत सुरक्षा में कमी बनी रही तो अंतरराष्ट्रीय छात्रों की भर्ती में गिरावट आ सकती है, जिससे विश्वविद्यालय की आय और प्रतिष्ठा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

Updated: October 2, 2026

Insight: The DU march shows that student activism is now the catalyst forcing Indian universities to convert policy promises into enforceable safety infrastructure, not just paperwork. If institutions ignore these pressure points, they risk eroding both domestic trust and international revenue streams, turning campus security into a fiscal and reputational flashpoint.

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