यह परियोजना एक वैज्ञानिक टीम द्वारा की गई थी, जो इस कार्य को पूरा करने के लिए लगभग 20 वर्ष कीमत उठाती है। इस टीम ने वृक्ष के विभिन्न भागों का विश्लेषण किया और इसका इतिहास खोजने के लिए विभिन्न प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन किया। इसके अलावा, उन्होंने वृक्ष के आसपास के इलाकों में किए गए खनन और निर्माण कार्यों का विश्लेषण भी किया।
इस परियोजना के परिणामस्वरूप, यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह बाँगन वृक्ष 700 वर्ष पुराना है। दुनिया भर में इस वृक्ष को एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पहचाना जाएगा।
बिहार सरकार ने भी इस परियोजना का स्वागत किया है। राज्य के वन मंत्री ने कहा कि यह परियोजना हमारे राज्य के ऐतिहासिक महत्व को उजागर करती है। यह वृक्ष हमारे देश की सांस्कृतिक धरोहर का एक हिस्सा है, और हम इसे संरक्षित करने और इसके महत्व को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे।
वृक्ष विज्ञानी और पर्यावरणविद् इस परियोजना की सराहना करते हैं कि यह वृक्ष के महत्व को दुनिया तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा, यह परियोजना हमें बताती है कि कैसे एक वृक्ष जीवन के साथ जुड़ा हुआ है। यह हमें वृक्षों का महत्व समझने और उनकी रक्षा करने के लिए प्रेरित करती है।
अन्य संबंधित पक्ष जैसे कि स्थानीय निवासी, पर्यटक और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने भी इसका समर्थन किया और कहा कि इस परियोजना से विश्व प्रसिद्ध लचकिला वृक्ष, बिहार में पर्यटन को बढ़ावा देगा।
इस परियोजना के परिणामस्वरूप दुनिया भर में मीडिया का ध्यान इस प्राचीन वृक्ष की ओर गया है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह परियोजना स्थानीय स्तर पर पर्यटन को बढ़ावा देगी और लोगों में जागरूकता बढ़ाएगी कि कैसे हम अपने वातावरण की रक्षा कर सकते हैं।
लेकिन फिर भी, कई सवाल उठते हैं कि क्या इस टर्मिनल बांगन को संरक्षित करने की आवश्यकता है और कैसे हम इसकी सुरक्षा कर सकते हैं। इसका जवाब देने के लिए, अन्य विशेषज्ञ इस वृक्ष के संरक्षण के लिए रणनीति तैयार करने के लिए काम कर रहे हैं।