करने से पहले संबंधित विभाग से अनुमति एवं स्थानिक मानचित्र प्राप्त करना अनिवार्य किया गया है। यह कदम गैस आपूर्ति नेटवर्क की सुरक्षा को बढ़ाने और अनजाने में होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा और आर्थिक नुकसान दोनों पर असर को कम किया जा सके।
पिछले दो महीनों
में, दिल्ली के प्रमुख सड़कों पर चल रहे विभिन्न बुनियादी ढाँचा कार्यों के दौरान दो प्रमुख गैस लीक की घटनाएँ दर्ज की गईं। पहली घटना में एक प्रमुख राजमार्ग पर निर्माण कार्य के दौरान 15 मीटर लंबी गैस पाइपलाइन फट गई, जिससे अस्थायी रूप से यातायात बंद होना पड़ा और कई निवासियों को घरों से बाहर निकाला
गया। दूसरी घटना में एक छोटे स्तर के सड़क पुनर्निर्माण के दौरान गैस लीक से कुछ घंटे में 30 वर्ग मीटर क्षेत्र में गैस का रिसाव हुआ, जिससे स्थानीय स्वास्थ्य विभाग को आपातकालीन उपाय करने पड़े। इन घटनाओं ने न केवल सुरक्षा प्रश्न उठाए, बल्कि गैस वितरण कंपनी THINK Gas को भी आर्थिक नुकसान का सामना करना
पड़ा।
THINK Gas के अनुसार, इन दो घटनाओं के कारण कंपनी को कुल मिलाकर लगभग 1.2 करोड़ रुपये का तत्काल नुकसान हुआ, जिसमें लीक की मरम्मत, आपातकालीन शटडाउन, तथा प्रभावित क्षेत्रों में वैकल्पिक ऊर्जा व्यवस्था की व्यवस्था शामिल है। कंपनी ने यह भी कहा कि इन घटनाओं से कंपनी की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा है और
भविष्य में निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए कठोर सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है। उद्योग विशेषज्ञों ने इस बात को दोहराया कि गैस पाइपलाइन का उचित मानचित्रण और समय पर सूचना देना किसी भी बड़े बुनियादी ढाँचा प्रोजेक्ट की सफलता के लिए अनिवार्य है।
वर्तमान आदेश के तहत, दिल्ली के सार्वजनिक कार्य विभाग (PWD), राजमार्ग
प्राधिकरण (NHAI), तथा जल एवं स्वच्छता विभाग को नई प्रक्रियात्मक नियमावली का पालन करना अनिवार्य किया गया है। इस नियमावली के अनुसार, किसी भी खुदाई कार्य से पहले गैस पाइपलाइन का विस्तृत स्थानिक लेयर मानचित्र प्राप्त करना, और संबंधित गैस कंपनी से लिखित स्वीकृति लेना आवश्यक है। इसके अलावा, सभी ठेकेदारों को इस प्रक्रिया के बारे में
प्रशिक्षण सत्र में भाग लेना अनिवार्य किया गया है, जिसमें संभावित जोखिम, आपातकालीन प्रोटोकॉल, तथा स्थानीय सुरक्षा कर्मियों के साथ समन्वय के महत्व पर प्रकाश डाला गया।
THINK Gas ने इस आदेश को “एक सकारात्मक कदम” बताया, जिससे कंपनी को अपने मौजूदा नेटवर्क की सुरक्षा को पुनः मूल्यांकन करने का अवसर मिलेगा। कंपनी ने बताया कि
अब वह सभी सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर एकीकृत GIS (भौगोलिक सूचना प्रणाली) प्लेटफ़ॉर्म तैयार कर रही है, जो वास्तविक‑समय में पाइपलाइन की स्थिति को अपडेट करेगा। इस प्रणाली के कार्यान्वयन से न केवल खुदाई कार्यों में त्रुटियों को कम किया जा सकेगा, बल्कि गैस लीक की संभावनाओं को भी न्यूनतम किया जा सकेगा।
राज्य के
जलवायु और पर्यावरण विभाग ने भी इस दिशा में अपना समर्थन व्यक्त किया, यह बताते हुए कि गैस लीक के कारण उत्पन्न होने वाले हानिकारक गैसों से वायुमंडलीय प्रदूषण में वृद्धि हो सकती है। विभाग ने कहा कि यदि इस नई प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से लागू किया गया तो न केवल मानव जीवन की सुरक्षा होगी,
बल्कि पर्यावरणीय क्षति को भी रोका जा सकेगा। विभाग ने अपने वार्षिक रिपोर्ट में इस कदम को “पर्यावरणीय सुरक्षा के लिये एक रणनीतिक पहल” के रूप में उल्लेख किया।
गैस पाइपलाइन के प्रमुख नियामक, राष्ट्रीय पेट्रोलियम निगम (ONGC) ने भी इस निर्देश का स्वागत किया और कहा कि यह राष्ट्रीय स्तर पर गैस बुनियादी ढाँचा सुरक्षा
को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ONGC ने यह भी कहा कि वे भविष्य में इस तरह की प्रक्रिया को सभी राज्यों में लागू करने की संभावना पर विचार कर रहे हैं, जिससे देशभर में गैस आपूर्ति नेटवर्क की सुरक्षा मानक समान हो सकें।
दूसरी ओर, विभिन्न निर्माण ठेकेदारों ने इस आदेश
के लागू होने में संभावित देरी की चिंता जताई। उन्होंने बताया कि नई प्रक्रिया के कारण प्रोजेक्ट शेड्यूल में अतिरिक्त समय लग सकता है, जिससे लागत में वृद्धि हो सकती है। कुछ प्रमुख ठेकेदारों ने कहा कि यदि सरकार इस नई प्रक्रिया को सरल और डिजिटल बना दे तो यह बाधा कम हो सकती है। इस संदर्भ
में, निर्माण संघ ने सरकार से अनुरोध किया कि वे प्रक्रिया को ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से तेज़ बनाएं, जिससे वास्तविक‑समय में स्वीकृति प्राप्त की जा सके।
राजनीतिक विश्लेषकों ने इस कदम को सरकार की सार्वजनिक सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में पढ़ा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की न
Updated: September 17, 2026
By mandating “call before you dig,” Delhi is turning risk‑management into a bureaucratic safeguard—an antidote to the reckless construction frenzy that has repeatedly exposed the city’s hidden gas arteries. This new protocol, if digitized swiftly, could shift the burden of safety from reactive firefighting to proactive, data‑