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बिहार के माँ वन देवी मंदिर को फ़िल्म ‘द वन’ ने पर्यटन‑आर्थिक बूम का नया केंद्र बना दिया।

बिहार के बिहटा के पास स्थित माँ वन देवी मंदिर, जहाँ शाम के बाद प्रवेश बंद हो जाता है, को हाल ही में फिल्म “द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट” के सेटिंग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की इस आगामी फ़िल्म की कहानी

में इस मंदिर के आसपास के जंगल को प्रमुख पृष्ठभूमि के रूप में दिखाया गया है, जिससे इस प्राचीन स्थल पर नई रुचि जागृत हुई है। स्थानीय जनसमुदाय और पर्यटक दोनों ही इस बदलाव को लेकर जिज्ञासु और सावधान दिखे हैं।

माँ वन देवी मंदिर की उत्पत्ति के बारे में

कई लोककथाएँ पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह स्थान एक घनी वन के भीतर स्थित था, जहाँ शाम होते ही अंधेरे की भयावहता से लोग दूर भागते थे। इस कारण मंदिर के द्वार पर “शाम को बंद” का संकेत लगाया गया, जिससे स्थानीय

परम्परा में इसे पवित्र माना गया। कई वर्ष पहले तक यह मंदिर केवल स्थानीय भक्तों के लिए ही उपलब्ध था, परन्तु आज यह पर्यटन स्थलों की सूची में भी शामिल हो रहा है।

इतिहासकारों का मानना है कि इस क्षेत्र का सामाजिक और धार्मिक महत्व प्राचीन वैदिक ग्रंथों में भी

उल्लेखित है। विभिन्न पुरातात्विक सर्वेक्षणों से मिले प्रमाण यह दर्शाते हैं कि इस स्थान पर कई शताब्दियों से पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। स्थानीय अभिलेखों में यह भी दर्ज है कि यहाँ के बंधु बंधवाँ ने वार्षिक मेले का आयोजन किया, जिससे आर्थिक लाभ की संभावनाएँ उत्पन्न हुईं। इस

प्रकार, मंदिर का सांस्कृतिक धरोहर के रूप में महत्व आज भी बना हुआ है।

फिल्म निर्माण टीम ने इस स्थान को चुनते समय कई कारकों को ध्यान में रखा। निर्देशक सिद्धार्थ मल्होत्रा ने बताया कि उन्हें इस मंदिर की “अलग ही aura” ने आकर्षित किया, जहाँ प्रकृति और आध्यात्मिकता का

मिश्रण स्पष्ट रूप से महसूस होता है। फिल्म की कहानी में एक रहस्यमयी जंगल, जहाँ पर मानवीय संघर्ष और प्रकृति के बीच का टकराव दर्शाया गया है, उसी वास्तविक स्थल से प्रेरित है। शूटिंग के दौरान टीम ने स्थानीय लोगों से सहयोग मांगा और कई बार मंदिर के नियमों का सम्मान

किया।

फिल्म की शूटिंग से पहले, सेट की तैयारियों में स्थानीय कारीगरों को भी शामिल किया गया। उन्होंने मंदिर के प्राचीन वास्तुशिल्प को बरकरार रखते हुए फिल्म की सजावट में स्थानीय कला को सम्मिलित किया। इस प्रक्रिया में कई छोटे-छोटे व्यापारियों को लाभ मिला, जिससे क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों में

वृद्धि हुई। साथ ही, फिल्म के स्टाफ ने पर्यावरणीय संरक्षण के उपाय अपनाए, जिससे वन्य जीवों और वनस्पति पर न्यूनतम प्रभाव पड़ा।

फिल्म के प्रीमियर के बाद, इस मंदिर की लोकप्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। सोशल मीडिया पर इस स्थान की तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिससे

बाहर से पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। स्थानीय प्रशासन ने भी इस बढ़ती भीड़ को संभालने के लिए विशेष व्यवस्था की, जिसमें सुरक्षा गार्ड और संकेत बोर्ड लगाए गए। हालांकि, कुछ स्थानीय निवासी इस बढ़ती भीड़ को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि इससे मंदिर की शांति और पवित्रता

पर असर पड़ सकता है।

स्थानीय पुजारी ने बताया कि फिल्म की वजह से कई नई पीढ़ियों को इस पवित्र स्थल की ओर आकर्षित किया गया है, परन्तु वे यह भी आश्वस्त करते हैं कि मंदिर के नियमों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि शाम को बंद होना

एक प्राचीन प्रथा है, जिसे सभी को सम्मानित करना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने दर्शकों को विनती की कि वे मंदिर में प्रवेश करते समय शांति और शुद्धता बनाए रखें।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की फिल्मी पहचान छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए नई संभावनाओं

का द्वार खोल सकती है। उन्होंने कहा कि इस पहल से पर्यटन, स्थानीय व्यवसाय और सांस्कृतिक संरक्षण में संतुलन बना रह सकता है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि अनियंत्रित विकास हुआ तो सांस्कृतिक विरासत को जोखिम हो सकता है।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो इस

मंदिर के आसपास के छोटे व्यापारियों को नई आय के स्रोत मिल रहे हैं। होटल, भोजनालय और स्मृति चिन्ह बेचने वाले स्टॉल ने अपनी बिक्री में बढ़ोतरी दर्ज की है। स्थानीय मंडी में भी पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण वस्तुओं की मांग में इजाफा हुआ है।

Updated: September 18, 2026

Insight: The film’s spotlight turns a secluded shrine into a cultural showcase, proving that cinematic hype can instantly re‑brand heritage sites into economic engines. Yet the surge of visitors tests whether the ancient “closed at dusk” ritual can survive modern tourism’s appetite for spectacle.

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