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बिहार की जेलों में रक्षाबंधन पर बहनों ने सलाखों के बाहर कैदियों की कलाई पर राखी बांधी, सामाजिक पुनर्संयोजन की नई पहल को मान

बिहार में रक्षाबंधन के अवसर पर बहन‑भाई के भावनात्मक बंधन को विभिन्न मंचों पर प्रदर्शित किया गया, जिसमें विशेष रूप से जेलों में बंद कैदियों को बहनों द्वारा राखी बांधने की दृश्यावली ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया। यह कार्यक्रम राज्य सरकार की पहल का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य सामाजिक संगठना को मजबूती देना और जेल में रहने वाले कैदियों को परिवारिक स्नेह का अनुभव कराना था।
विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस पहल के तहत कई जेलों में विशेष व्यवस्था की गई, जहाँ बहनें सलाखों के बाहर से अपने भाइयों की कलाई पर राखी बंधा सकीं। इस कदम को सामाजिक पुनर्संयोजन के एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में सराहा गया।रक्षाबंधन का इतिहास सदियों पुराना है, परंतु भारत में इसका सामाजिक स्वरूप समय के साथ विविधतापूर्ण रूप ले चुका है। बिहार में इस त्योहार को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहाँ ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, राज्य सरकार ने सामाजिक एकता को बढ़ावा देने के लिए कई सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहलें शुरू की हैं, जिसमें अभावग्रस्त वर्गों तक सन्देश पहुँचाने के प्रयास शामिल हैं। इस संदर्भ में जेलों में बहनों द्वारा राखी बांधना, सामाजिक पुनःसंयोजन के सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप से लागू करने का एक नया आयाम प्रस्तुत करता है।

बिहार के जेल प्रणाली में सुधार के लिए कई वर्षों से विभिन्न नीति‑निर्देश लागू किए जा रहे हैं।

२०१८ में शुरू हुए “सामाजिक पुनर्वास कार्यक्रम” के अंतर्गत कैदियों को शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन प्रदान किया जाता है। इस कार्यक्रम की एक उपधारा के रूप में, विशेष त्योहारों में परिवारिक जुड़ाव को सुदृढ़ करने के लिए विभिन्न आयोजन किए जाते हैं। रक्षाबंधन के अवसर पर इस पहल को लागू करने के लिये, जेल प्रशासन ने सुरक्षा प्रोटोकॉल को पुनः व्यवस्थित किया, जिससे बहनों को सुरक्षित रूप से प्रवेश और निकास की सुविधा मिली। इस प्रक्रिया में जेल के भीतर अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती और विशेष प्रवेश पथ स्थापित किए गए।

रक्षाबंधन के दिन, पटना हाई कोर्ट जेल, राजगीर जेल, और बेगूसराय के प्रमुख जेलों में बहनों का बड़ा समूह उपस्थित हुआ। प्रत्येक जेल में अलग‑अलग समय‑सारिणी तय की गई, जिससे भीड़भाड़ से बचा जा सके। बहनों ने सलाखों के बाहर से अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधी, जबकि जेल के अधिकारी इस प्रक्रिया को निगरानी करते रहे। कई कैदी, जिन्हें पहले सामाजिक अलगाव की भावना थी, ने इस समारोह को अपने जीवन में एक सकारात्मक बदलाव के रूप में वर्णित किया। इस दौरान कई अभिभावक और सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित थे, जो इस प्रकार के सामाजिक संपर्क को प्रोत्साहित करने के लिए अपने समर्थन का इज़हार कर रहे थे।

राखी बंधने के साथ ही, जेल प्रशासन ने भाई‑बहन के बीच संवाद को आसान बनाने हेतु मोबाइल फोन और वीडियो कॉल की सुविधा भी उपलब्ध कराई। यह कदम कई परिवारों के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि पहले यह सुविधा अत्यंत सीमित थी। कुछ कैदीयों ने बताया कि इस रक्षाबंधन के बाद वे अपने जीवन में नई ऊर्जा महसूस कर रहे हैं और पुनर्वास कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी की संभावना बढ़ी है। इस पहल को राज्य के सामाजिक कार्य विभाग ने “परिवारिक जुड़ाव एवं पुनर्संयोजन” के तहत एक मॉडल कार्यक्रम के रूप में मान्यता दी।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस अवसर पर एक विशेष समारोह में बहनों से राखी बांधवाया, जिसमें उन्होंने सामाजिक एकता और पुनर्संयोजन के महत्व पर प्रकाश डाला। मुख्यमंत्री ने कहा कि “रक्षाबंधन केवल भाई‑बहन के स्नेह का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्संयोजन का एक अवसर भी है।

हमें इस प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से समाज को एकजुट करने की आवश्यकता है।” इस समारोह में कई अन्य राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी भाग लेकर बहनों को राखी बांधी। मुख्यमंत्री द्वारा पहने गए पीले कुर्ते और पिंक धोती के रंग ने इस कार्यक्रम में एक विशेष सांस्कृतिक अभिव्यक्ति जोड़ी, जिसे मीडिया ने व्यापक रूप से कवरेज दिया।

राखी बांधने के कार्यक्रम में भाग लेने वाली बहनों ने अपने अनुभवों को सामाजिक मंच पर साझा किया। कई बहनों ने कहा कि जेल में भाई को देख कर उनका भावनात्मक भार हल्का हुआ और उन्होंने अपने भाई के लिए आशा की नई किरण देखी। इस भावना को व्यक्त करने के लिये उन्होंने सामाजिक मीडिया पर विभिन्न तस्वीरें और वीडियो पोस्ट किए, जिससे सार्वजनिक प्रतिक्रिया में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई। दूसरी ओर, कुछ कैदियों ने बताया कि इस समारोह के दौरान उनके मन में पुनर्वास की नई इच्छा उत्पन्न हुई, जो भविष्य में बेहतर सामाजिक सहभागिता की संभावना को बढ़ाता है।

जेल प्रशासन के प्रतिनिधियों ने बताया कि इस कार्यक्रम को सफल बनाने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, विशेष रूप से सुरक्षा और अनुशासन के मुद्दों को संभालना। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में इसी प्रकार के सामाजिक कार्यक्रमों को अधिक व्यवस्थित करने के लिये अतिरिक्त संसाधन और प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।

Updated: August 28, 2026


Bihar’s government orchestrated a Raksha Bandhan drive that let sisters tie rakhis to incarcerated brothers, supplementing the ceremony with video‑call access to strengthen family bonds. Officials hailed the event as a fresh model for social reintegration, noting a boost in inmates’ morale and renewed interest in rehabilitation programmes.

Bihar’s “Rakhi behind bars” turns a ritual of sibling love into a low‑cost rehabilitation lever, showing that emotional bonds can soften the psychological walls of incarceration. If replicated, such culturally‑tuned family outreach could become a scalable shortcut to reducing recidivism across India’s crowded prisons.

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