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कर्नाटक सरकार ने आदेश दिया: सार्वजनिक समारोहों में राष्ट्रगान “वन्दे मातरम्” के केवल दो पद्य बजाएंगे।

कर्नाटक सरकार ने कल एक नई आदेश जारी किया है, जिसमें राज्य स्तर के सभी सार्वजनिक समारोहों में राष्ट्रगान “वन्दे मातरम्” के केवल दो पद्य ही बजाने या गाने की अनुमति होगी। यह निर्णय, जो मुख्यमंत्री के कार्यालय ने हस्ताक्षर किए हैं, आधिकारिक दस्तावेज़ में स्पष्ट किया गया है कि यह प्रतिबंध सभी सरकारी सभाओं, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक

आयोजनों पर लागू होगा, सिवाय उन विशेष अवसरों के जहाँ भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्य के राज्यपाल उपस्थित हों। इस आदेश का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को बनाए रखते हुए राज्य की सांस्कृतिक विविधता को सम्मानित करना बताया गया है।

वन्दे मातरम्, जिसे प्रथम बार 1911 के बांग्ला सम्मेलन में सुनाया गया, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में

एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है और इसे 1950 में भारत का आधिकारिक राष्ट्रगान घोषित किया गया। परन्तु इसका मूल रूप छह पद्यों का है, जिसमें केवल प्रथम दो पद्य अक्सर आधिकारिक समारोहों में बजाए जाते हैं। पिछले कुछ दशकों में कई राज्यों ने इस गीत के पूर्ण संस्करण को विभिन्न मंचों पर प्रस्तुत करने की अनुमति दी, जबकि

कुछ मामलों में पूर्ण संस्करण को लेकर राजनीतिक वाद-विवाद भी हुआ। कर्नाटक की इस नई नीति का परिचय इस संदर्भ में एक नया मोड़ दर्शाता है।

राज्य सरकार ने इस आदेश के पीछे के कारणों को आर्थिक और प्रशासनिक दो पहलुओं से समझाया है। आधिकारिक बयान में कहा गया है कि सरकारी समारोहों में बजाए जाने वाले संगीत

और गीतों की अवधि को घटाने से कार्यक्रम की लागत में कटौती होगी, साथ ही सार्वजनिक स्थल पर ध्वनि नियंत्रण के मानकों को भी सुदृढ़ किया जाएगा। इसके अलावा, यह कदम सांस्कृतिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए विभिन्न भाषा‑समुदायों के बीच संतुलन स्थापित करने के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ कन्नड़, तेलुगु और तमिल

आदि भाषाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इस आदेश के तहत, राज्य के सभी विभागों को नई दिशानिर्देशों के अनुसार अपने कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करनी होगी। सरकारी सचिवालय ने निर्देश जारी किया है कि हर विभाग को आगामी दो महीनों में अपने कार्यक्रमों की सूची प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें गीत चयन और समयावधि स्पष्ट

रूप से दर्शाई जाएगी। विभागीय प्रमुखों को यह भी सूचित किया गया है कि यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल की उपस्थिति सुनिश्चित है, तो छह पद्यों का पूर्ण संस्करण बजाया जा सकता है, जिससे इस अपवाद को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

कर्नाटक के शिक्षा विभाग ने इस आदेश को लागू करने

में विशेष सावधानी बरतने का संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि स्कूलों और महाविद्यालयों में आयोजित समारोहों में अब केवल दो पद्य बजाए जाएंगे, जिससे विद्यार्थियों को राष्ट्रगान के मूल रूप से परिचित कराते हुए भी समय की बचत होगी। इस दिशा में, कई शैक्षणिक संस्थानों ने अपने कार्यक्रमों में संशोधन की योजना बनाई है, जिससे सांस्कृतिक कार्यक्रमों का

स्वरूप थोड़ा बदल सकता है। यह कदम, विभाग के अनुसार, विद्यार्थियों के सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देगा और साथ ही कार्यक्रम की समयावधि को संक्षिप्त करेगा।

राज्य के पर्यटन विभाग ने भी इस नई नीति को अपनाते हुए कहा कि पर्यटन स्थलों पर आयोजित सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में अब केवल दो पद्य का प्रयोग किया जाएगा, जिससे पर्यटकों को

संक्षिप्त लेकिन प्रभावी राष्ट्रीय भावना प्रदान की जा सके। इस निर्णय के समर्थन में कई सांस्कृतिक संगठनों ने अभिव्यक्ति की है कि इससे कार्यक्रम अधिक सुसंगत और आकर्षक बनेंगे, जबकि कुछ समूहों ने पूर्ण गीत के महत्व को उजागर करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ इस आदेश पर मिश्रित हैं। कर्नाटक कांग्रेस दल

के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इस निर्णय को “सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने” की दिशा में एक सकारात्मक कदम कहा, जबकि उन्होंने यह भी कहा कि पूर्ण गीत का अभाव राष्ट्रीय भावना को कमजोर नहीं कर सकता। दूसरी ओर, भाजपा के कई प्रतिनिधियों ने आदेश को “अतिरिक्त बंधन” के रूप में निंदा किया और कहा कि यह राष्ट्रीय एकता

को प्रभावित कर सकता है। दोनों पक्षों ने यह भी कहा कि यह निर्णय उच्च न्यायालय में चुनौती के दायरे में जा सकता है।

कई सामाजिक संगठनों ने इस आदेश पर सार्वजनिक चर्चा शुरू कर दी है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक युवा नेता ने कहा कि दो पद्य का चयन “समय की माँग” को दर्शाता है, परन्तु

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पूर्ण गीत को केवल विशिष्ट उच्च पदाधिकारियों के साथ सीमित करने से राष्ट्रीय एकता में बाधा नहीं आनी चाहिए। वहीं, एक प्रमुख कन्नड़ साहित्यिक समूह ने इस निर्णय को “भाषा‑सुरक्षा” के रूप में देखा, जबकि उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि पूर्ण गीत का उपयोग राष्ट्रीय गौरव को बढ़ावा देता है।

आर्थिक दृष्टिकोण से, राज्य के वित्तीय विभाग ने इस आदेश को खर्च में कमी के एक साधन के रूप में देखा है। उन्होंने अनुमान लगाया है कि इस बदलाव से सरकारी कार्यक्रमों में ध्वनि उपकरण, समय‑निर्धारण और तकनीकी समर्थन में लगभग 3–5 प्रतिशत लागत बच

Updated: September 21, 2026

Karnataka’s truncation of “Vande Mātaram” signals a calculated blend of fiscal prudence and cultural balancing, using the anthem’s brevity to curb expenses while placating non‑Kannada language groups.

Yet the exception for top‑tier dignitaries creates a symbolic hierarchy that

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